अध्याय 5 - श्लोक 29

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ २९ ॥

bhoktāraṃ yajñatapasāṃ sarvalokamaheśvaram .
suhṛdaṃ sarvabhūtānāṃ jñātvā māṃ śāntimṛcchati .. 29 ..


(मनुष्य) मुझ नारायणको कर्तारूपसे और देवरूपसे समस्त यज्ञों और तपोंका भोक्ता, सर्वलोक-महेश्वर अर्थात् सब लोकोंका महान् ईश्वर, समस्त प्राणियोंका सुहृद्—प्रत्युपकार न चाहकर उनका उपकार करनेवाला, सब भूतोंके हृदयमें स्थित, सब कर्मोंके फलोंका स्वामी और सब संकल्पोंका साक्षी जानकर शान्तिको अर्थात् सब संसारसे उपरामताको प्राप्त हो जाता है ॥ २९ ॥

यथार्थ ज्ञानके लिये जो अन्तरङ्ग साधन है उस ध्यानयोगके सूत्ररूप जिन ‘स्पर्शान्कृत्वा बहिः’ इत्यादि श्लोकोंका पूर्वाध्यायके अन्तमें उपदेश किया है, उन श्लोकोंका व्याख्यारूप यह छठा अध्याय आरम्भ किया जाता है।

परंतु ध्यानयोगका बहिरङ्ग साधन कर्म है, इसलिये जबतक ध्यानयोगपर आरूढ होनेमें समर्थ न हो, तबतक अधिकारी गृहस्थको कर्म करना चाहिये, अतः उस (कर्म)-की स्तुति करते हैं।

पू०—ध्यानयोगपर आरूढ होनेतककी सीमा क्यों बाँधी गयी ? जबतक जीवे तबतक विहित कर्मोंका अनुष्ठान तो सबको करते ही रहना चाहिये।

उ०—यह ठीक नहीं; क्योंकि ‘योगपर आरूढ़ होनेकी इच्छावाले मुनिके लिये कर्म कर्तव्य कहे गये हैं’ ऐसा कहा है और योगारूढ़ योगीका केवल उपशमसे ही सम्बन्ध बतलाया गया है।

यदि आरुरुक्षु और आरूढ दोनोंहीके लिये शम और कर्म दोनों ही कर्तव्यरूपसे माने गये हों तो आरुरुक्षु और आरूढके शम और कर्म अलग-अलग विषय बतलाकर विशेषण देना और विभाग करना व्यर्थ होगा।

पू०—उन आश्रमवालोंमें कोई योगारूढ होनेकी इच्छावाला होता है और कोई आरूढ होता है, परंतु कुछ दूसरे न तो आरूढ होते हैं और न आरुरुक्षु ही होते हैं। उनकी अपेक्षासे ‘आरुरुक्षु’ और ‘आरूढ’ यह विशेषण देना और (उन दोनों प्रकारके योगियोंको साधारण श्रेणीके लोगोंसे पृथक् करके) उनका विभाग करना, ये दोनों बातें ही बन सकती हैं।

उ०—यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि ‘तस्यैव’ इस पदका प्रयोग किया गया है। एवं ‘योगारूढस्य’ इस विशेषणमें योग शब्द भी ग्रहण किया गया है। अर्थात् जो पहले योगका आरुरुक्षु था वही जब योगपर आरूढ हो गया तो उसी योगारूढका योग-फलकी प्राप्तिके लिये शम ही कारण यानी कर्तव्य बताया गया है। इसलिये किसी भी कर्मके लिये जीवनपर्यन्त कर्तव्यताकी प्राप्ति नहीं होती।

तथा योगभ्रष्टविषयक वर्णनसे भी यही बात सिद्ध होती है। अभिप्राय यह कि यदि कर्म करनेवाले गृहस्थके लिये भी छठे अध्यायमें कहा हुआ योग विहित हो, तो वह योगसे भ्रष्ट हुआ भी कर्मोंकी गतिको अर्थात् कर्मोंके फलको तो प्राप्त होता ही है, इसलिये उसके नाशकी आशङ्का युक्तियुक्त नहीं रह जाती।

क्योंकि नित्य होनेके कारण मोक्ष तो कर्मोंसे प्राप्त हो ही नहीं सकता। इसलिये किये हुए काम्य या नित्य कर्म अपने फलका आरम्भ अवश्य ही करेंगे।

नित्यकर्म भी वेदप्रमाणद्वारा विज्ञात होनेके कारण अवश्य ही फल देनेवाले होते हैं, नहीं तो वेदको निरर्थक माननेका प्रसङ्ग आ जाता है, यह पहले कह चुके हैं। कर्मोंके नाशक किसी हेतुकी कोई सम्भावना न होनेके कारण कर्मोंके रहते हुए (गृहस्थको) उभयभ्रष्ट कहना युक्तियुक्त नहीं हो सकता।

पू०—यदि ऐसा मानें कि ‘वे कर्म ईश्वरमें अर्पण करके’ किये गये हैं, इसलिये वे कर्ताके लिये फलका आरम्भ नहीं करेंगे।

उ०—यह ठीक नहीं; क्योंकि ईश्वरमें अर्पण किये हुए कर्मोंका तो और भी अधिक फल देनेवाला होना ही युक्तिसंगत है।

पू०—यदि ऐसे मानें कि वे कर्म केवल मोक्षके लिये ही होते हैं अर्थात् अपने किये हुए कर्मोंका जो ईश्वरमें योगसहित (समतापूर्वक) संन्यास है वह केवल मोक्षके लिये ही होता है, दूसरे फलके लिये नहीं और वह उस योगसे (समत्वसे) भ्रष्ट हो गया है, अतः उसके लिये नाशकी आशङ्का ठीक ही है।

उ०—यह भी ठीक नहीं; क्योंकि ‘एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रह:’ ‘ब्रह्मचारिव्रते स्थित:’ आदि वचनोंद्वारा कर्म-संन्यासका विधान किया गया है।

यहाँ ध्यानकालमें स्त्रीकी सहायताकी तो कोई आशङ्का नहीं होती कि जिससे गृहस्थके लिये एकाकीका विधान किया जाता। ‘निराशीरपरिग्रहः’ इत्यादि वचन भी गृहस्थके अनुकूल नहीं है तथा उभयभ्रष्टविषयक प्रश्नकी उपपत्ति न होनेके कारण भी (उपर्युक्त मान्यता) ठीक नहीं है।

पू०—‘अनाश्रित:’ इस श्लोकसे कर्म करनेवालेको ही संन्यासी और योगी कहा है, अग्रिरहित और क्रियारहितके संन्यासित्व और योगित्वका निषेध किया है।

उ०—यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि यह श्लोक केवल ध्यानयोगके लिये बहिरंग साधनरूप कर्मोंके फलाकाङ्क्षासम्बन्धी संन्यासकी स्तुति करनेके निमित्त ही है।

केवल अग्रिरहित और क्रियारहित ही संन्यासी और योगी होता है; ऐसा नहीं, किंतु जो कोई कर्म करनेवाला भी कर्मफल और आसक्तिको छोड़कर अन्त:करणकी शुद्धिके लिये कर्मयोगमें स्थित है वह भी संन्यासी और योगी है, इस प्रकार कर्मयोगीकी स्तुति की गयी है।

एक ही वाक्यसे कर्मफलविषयक आसक्तिके त्यागरूप संन्यासकी स्तुति और चतुर्थ आश्रमका प्रतिषेध नहीं बन सकता।

अग्निरहित और क्रियारहित वास्तविक संन्यासीका संन्यासित्व और योगित्व जो श्रुति, स्मृति, पुराण, इतिहास और योगशास्त्रसे विहित तथा सर्वत्र प्रसिद्ध है उसका भगवान् प्रतिषेध नहीं करते; क्योंकि इससे भगवान्के अपने कथनमें भी विरोध आता है।

अभिप्राय यह है कि ‘सब कर्मोंको मनसे छोड़कर’ ‘न करता हुआ न करवाता हुआ रहता है’ ‘मौन भाववाला जिस किस प्रकारसे भी सदा संतुष्ट’ ‘बिना घर-द्वारवाला स्थिरबुद्धि’ ‘जो पुरुष समस्त कामनाओंको छोड़कर निःस्पृह भावसे विचरता है’ ‘समस्त आरम्भोंका त्यागी’ इस प्रकार जगह-जगह भगवान्ने जो अपने वचन प्रदर्शित किये हैं, उनसे चतुर्थ आश्रमके प्रतिषेधका विरोध है।

इसलिये (यह सिद्ध हुआ कि) जो गृहस्थाश्रममें स्थित पुरुष योगारूढ होनेकी इच्छावाला और मननशील है, उसके फल न चाहकर अनुष्ठान किये हुए अग्निहोत्रादि कर्म अन्तःकरणकी शुद्धिद्वारा ध्यानयोगमें आरूढ होनेके साधन बन सकते हैं।

इसी भावसे ‘वह संन्यासी और योगी है’ इस प्रकार उसकी स्तुति की जाती है—

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—

तात्पर्य पढ़ें

भोक्तारं यज्ञानां तपसां च कर्तृरूपेण देवतारूपेण च सर्वलोकमहेश्वरं सर्वेषां लोकानां महान्तम् ईश्वरं सर्वलोकमहेश्वरम्, सुहृदं सर्वभूतानां सर्वप्राणिनां प्रत्युपकारनिरपेक्षतया उपकारिणम्, सर्वभूतानां हृदयेशयं सर्वकर्मफलाध्यक्षं सर्वप्रत्ययसाक्षिणं मां नारायणं ज्ञात्वा शान्तिं सर्वसंसारोपरतिम् ऋच्छति प्राप्नोति ॥ २९ ॥

अतीतान्तराध्यायान्ते ध्यानयोगस्य सम्यग्दर्शनं प्रति अन्तरङ्गस्य सूत्रभूताः श्लोकाः ‘स्पर्शान्कृत्वा बहिः’ इत्यादय उपदिष्टाः तेषां वृत्तिस्थानीयः अयं षष्ठः अध्याय आरभ्यते।

तत्र ध्यानयोगस्य बहिरङ्गं कर्म इति यावद् ध्यानयोगारोहणासमर्थः तावद् गृहस्थेन अधिकृतेन कर्तव्यं कर्म इति अतः तत् स्तौति।

ननु किमर्थं ध्यानयोगारोहणसीमाकरणं यावता अनुष्ठेयम् एव विहितं कर्म यावज्जीवम् ।

न, ‘आरुरुक्षोः मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते’ इति विशेषणाद् आरूढस्य च शमेन एव सम्बन्धकरणात्।

आरुरुक्षोः आरूढस्य च शमः कर्म च उभयं कर्तव्यत्वेन अभिप्रेतं चेत् स्यात् तदा आरुरुक्षोः आरूढस्य च इति शमकर्मविषयभेदेन विशेषणं विभागकरणं च अनर्थकं स्यात् ।

तत्र आश्रमिणां कश्चिद् योगम् आरुरुक्षुः भवति आरूढः च कश्चिद् अन्ये न आरुरुक्षवो न च आरूढाः तान् अपेक्ष्य आरुरुक्षोः आरूढस्य च इति विशेषणं विभागकरणं च उपपद्यते एव इति चेत् ।

न, ‘तस्यैव’ इति वचनात्। पुनः योग-ग्रहणात् च ‘योगारूढस्य’ इति य आसीत् पूर्वं योगम् आरुरुक्षुः तस्य एव आरूढस्य शम एव कर्तव्यं कारणं योगफलं प्रति उच्यते इति। अतो न यावज्जीवं कर्तव्यत्वप्राप्तिः कस्यचिद् अपि कर्मणः।

योगविभ्रष्टवचनात् च। गृहस्थस्य चेत् कर्मिणो योगो विहितः षष्ठे अध्याये स योगविभ्रष्टः अपि कर्मगतिं कर्मफलं प्राप्नोति इति तस्य नाशाशङ्का अनुपपन्ना स्यात्।

अवश्यं हि कृतं कर्म काम्यं नित्यं वा मोक्षस्य नित्यत्वाद् अनारभ्यत्वे स्वं फलम् आरभते एव ।

नित्यस्य च कर्मणो वेदप्रमाणावबुद्धत्वात् फलेन भवितव्यम् इति अवोचाम अन्यथा वेदस्य आनर्थक्यप्रसङ्गाद् इति। न च कर्मणि सति उभयविभ्रष्टवचनम् अर्थवत् कर्मणो विभ्रंशकारणानुपपत्तेः ।

कर्म कृतम् ईश्वरे संन्यस्य इति अतः कर्तरि कर्म फलं न आरभते इति चेत्।

न, ईश्वरे संन्यासस्य अधिकतरफल-हेतुत्वोपपत्तेः ।

मोक्षाय एव इति चेत् स्वकर्मणां कृतानाम्

ईश्वरे न्यासो मोक्षाय एव न फलान्तराय

योगसहितो योगात् च विभ्रष्ट इति अतः तं प्रति नाशाशङ्का युक्ता एव इति चेत्।

न, ‘एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः’

‘ब्रह्मचारिव्रते स्थितः’ इति कर्मसन्न्यासविधानात् ।

न च अत्र ध्यानकाले स्त्रीसहायत्वाशङ्का

येन एकाकित्वं विधीयते। न च गृहस्थस्य

‘निराशीरपरिग्रहः’ इत्यादिवचनम् अनुकूलम्

उभयविभ्रष्टप्रश्नानुपपत्तेः च ।

‘अनाश्रितः’ इति अनेन कर्मिण एव सन्न्यासित्वं योगित्वं च उक्तं प्रतिषिद्धं च निरग्नेः अक्रियस्य च सन्न्यासित्वं योगित्वं च इति चेत् ।

न, ध्यानयोगं प्रति बहिरङ्गस्य सतः कर्मणः

फलाकाङ्क्षासन्न्यासस्तुतिपरत्वात् ।

न केवलं निरग्निः अक्रिय एव सन्न्यासी

योगी च किं तर्हि कर्मी अपि कर्मफलासङ्गं

सन्न्यस्य कर्मयोगम् अनुतिष्ठन् सत्त्वशुद्ध्यर्थं स

सन्न्यासी च योगी च भवति इति स्तूयते।

न च एकेन वाक्येन कर्मफलासङ्गसन्न्यास-

स्तुतिः चतुर्थाश्रमप्रतिषेधः च उपपद्यते ।

न च प्रसिद्धं निरग्नेः अक्रियस्य परमार्थ-सन्न्यासिनः श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासयोग-शास्त्रविहितं सन्न्यासित्वं योगित्वं च प्रतिषेधति भगवान्। स्ववचनविरोधात् च।

‘सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्य’ ‘नैव कुर्वन्न कारयन् आस्ते’ ‘मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्’ ‘अनिकेतः स्थिरमतिः’ ‘विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः’ ‘सर्वारम्भपरित्यागी’ इति च तत्र तत्र भगवता स्ववचनानि दर्शितानि तैः विरुध्येत चतुर्थाश्रमप्रतिषेधः।

तस्माद् मुनेः योगम् आरुरुक्षोः प्रतिपन्न-गार्हस्थ्यस्य अग्निहोत्रादि फलनिरपेक्षम् अनुष्ठीयमानं ध्यानयोगारोहणसाधनत्वं सत्त्वशुद्धिद्वारेण प्रतिपद्यते ।

इति स संन्यासी च योगी च इति स्तूयते—

इति श्रीमहाभारते शतसाहस्त्र्यां संहितायां वैयासिक्यां भीष्म-पर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसत्र्यासयोगो नाम

पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमच्छंकर-भगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्ये प्रकृतिगर्भो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥