अध्याय 5 - श्लोक 3

ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो
सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥

jñeyaḥ sa nityasannyāsī yo na dveṣṭi na kāṅkṣati.
nirdvandvo hi mahābāho
sukhaṃ bandhātpramucyate .. 3 ..


उस कर्मयोगी को सदा संन्यासी ही समझना चाहिये कि जो न तो द्वेष करता है और न किसी वस्तुकी आकाङ्क्षा ही करता है। अर्थात् जो सुख, दुःख और उनके साधनोंमें उक्त प्रकारसे राग-द्वेषरहित हो गया है, वह कर्ममें बर्तता हुआ भी सदा संन्यासी ही है ऐसे समझना चाहिये।

क्योंकि हे महाबाहो! राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंसे रहित हुआ पुरुष सुखपूर्वक—अनायास ही बन्धन से मुक्त हो जाता है ॥ ३ ॥

भिन्न पुरुषोंद्वारा अनुष्ठान करनेयोग्य परस्पर-विरुद्ध कर्मसंन्यास और कर्मयोगके फलमें भी विरोध होना चाहिये, दोनोंका कल्याणरूप एक ही फल कहना ठीक नहीं, इस शङ्काके प्राप्त होनेपर यह कहा जाता है—

तात्पर्य पढ़ें

जेयो ज्ञातव्यः स कर्मयोगी नित्यसन्न्यासी इति, यो न द्वेष्टि किञ्चिद् न काङ्क्षति, दुःखसुखे तत्साधने च एवंविधो यः कर्मणि वर्तमानः अपि स नित्यसन्न्यासी इति ज्ञातव्य इत्यर्थः।

निर्द्वन्द्वो द्वन्द्ववर्जितो हि यस्माद् महाबाहो सुखं बन्धाद् अनायासेन प्रमुच्यते ॥ ३ ॥

सन्न्यासकर्मयोगयोः भिन्नपुरुषानुष्ठेययोः विरुद्धयोः फले अपि विरोधो युक्तो न तु उभयोः निःश्रेयसकरत्वम् एव इति प्राप्ते इदम् उच्यते—