एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥ ४ ॥
sāṅkhyayogau pṛthagbālāḥ pravadanti na paṇḍitāḥ .
ekamapyāsthitaḥ samyagubhayorvindate phalam .. 4 ..
बालबुद्धिवाले ही सांख्य और योग—इन दोनोंको अलग–अलग विरुद्ध फलदायक बतलाते हैं, पण्डित नहीं।
ज्ञानी—पण्डितजन तो दोनोंका अविरुद्ध और एक ही फल मानते हैं।
क्योंकि सांख्य और योग—इन दोनोंमेंसे एकका भी भलीभाँति अनुष्ठान कर लेनेवाला पुरुष दोनोंका फल पा लेता है।
कारण दोनोंका वही (एक) कल्याणरूप (परमपद) फल है, इसलिये फलमें विरोध नहीं है।
पू०—‘संन्यास’ और ‘कर्मयोग’ इन शब्दोंसे प्रकरण उठाकर फिर यहाँ प्रकरणविरुद्ध सांख्य और योगके फलकी एकता कैसे कहते हैं?
उ०—यह दोष नहीं है। यद्यपि अर्जुनने केवल संन्यास और कर्मयोगको पूछनेके अभिप्रायसे ही प्रश्न किया था, परंतु भगवान्ने उसके अभिप्रायको न छोड़कर ही अपना विशेष अभिप्राय जोड़ते हुए ‘सांख्य’ और ‘योग’ ऐसे इन दूसरे शब्दोंसे उनका वर्णन करके उत्तर दिया है।
क्योंकि वे संन्यास और कर्मयोग ही (क्रमानुसार) ज्ञानसे और उसके उपायरूप समबुद्धि आदि भावोंसे युक्त हो जानेपर सांख्य और योगके नामसे कहे जाते हैं, यह भगवान्का मत है, अतः यह वर्णन प्रकरणविरुद्ध नहीं है ॥ ४ ॥
एकका भी भली प्रकार अनुष्ठान कर लेनेसे दोनों का फल कैसे पा लेता है ? इसपर कहा जाता है—
तात्पर्य पढ़ें
साङ्ख्ययोगौ पृथग् विरुद्धभिन्नफलौ बालाः
प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
पण्डिताः तु ज्ञानिन एकं फलम् अविरुद्धम् इच्छन्ति।
कथम् एकम् अपि साङ्ख्ययोगयोः सम्यग् आस्थितः सम्यग् अनुष्ठितवान् इत्यर्थः, उभयोः विन्दते फलम्।
उभयोः तद् एव हि निःश्रेयसं फलम् अतो न फले विरोधः अस्ति।
ननु सन्न्यासकर्मयोगशब्देन प्रस्तुत्य साङ्ख्ययोगयोः फलैकत्वं कथम् इह अप्रकृतं ब्रवीति।
न एष दोषः, यद्यपि अर्जुनेन सन्न्यासं कर्मयोगं च केवलम् अभिप्रेत्य प्रश्नः कृतः, भगवान् तु तदपरित्यागेन एव स्वाभिप्रेतं च विशेषं संयोज्य शब्दान्तरवाच्यतया प्रतिवचनं ददौ, साङ्ख्ययोगौ इति।
तौ एव सन्न्यासकर्मयोगौ ज्ञानतदुपायसम- बुद्धित्वादिसंयुक्तौ साङ्ख्ययोगशब्दवाच्यौ इति भगवतो मतम् अतो न अप्रकृतप्रक्रिया इति ॥ ४ ॥
एकस्य अपि सम्यग् अनुष्ठानात् कथम् उभयोः फलं विन्दते, इति उच्यते—