अध्याय 5 - श्लोक 6

सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति ॥ ६ ॥

sannyāsastu mahābāho duḥkhamāptumayogataḥ .
yogayukto munirbrahma na cireṇādhigacchati .. 6 ..


बिना कर्मयोग के पारमार्थिक संन्यास प्राप्त होना कठिन है—दुष्कर है।

तथा फल न चाहकर ईश्वर-समर्पण के भाव से किये हुए वैदिक कर्मयोग से युक्त हुआ, ईश्वर के स्वरूप का मनन करनेवाला मुनि, ब्रह्म को अर्थात् परमात्मज्ञाननिष्ठारूप पारमार्थिक संन्यास को, शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है, इसलिये मैंने कहा कि ‘कर्मयोग श्रेष्ठ है’। परमात्मज्ञान का सूचक होने से प्रकरण में वर्णित संन्यास ही ब्रह्म नाम से कहा गया है, तथा ‘संन्यास ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही पर है’ इस श्रुति से भी यही बात सिद्ध होती है ॥ ६ ॥

जब यह पुरुष सम्यक् ज्ञानप्राप्ति के उपायरूप—

तात्पर्य पढ़ें

सन्यास: तु पारमार्थिको दुःखम् आसुं प्राप्तुम् अयोगतो योगेन विना।

योगयुक्तो वैदिकेन कर्मयोगेन ईश्वरसमर्पित- रूपेण फलनिरपेक्षेण युक्तो मुनिः मननाद् ईश्वर- स्वरूपस्य मुनिः ब्रह्म परमात्मज्ञानलक्षणत्वात् प्रकृतः सन्न्यासो ब्रह्म उच्यते ‘न्यास इति ब्रह्म ब्रह्म हि परः’ (ना० उ० २। ७८) इति श्रुतेः। ब्रह्म परमार्थसन्न्यासं परमात्मज्ञाननिष्ठा लक्षणं न चिरेण क्षिप्रम् एव अधिगच्छति प्राप्नोति अतो मया उक्तम् ‘कर्मयोगो विशिष्यते’ इति ॥ ६ ॥

यदा पुनः अयं सम्यग्दर्शनप्राप्त्युपायत्वेन—