अध्याय 5 - श्लोक 8-9

नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्चिघ्नन्नश्नगाच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥ ८ ॥
प्रलपन्विसृजनाृह्ननुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९ ॥

naiva kiñcitkaromīti yukto manyeta tattvavit .
paśyañśṛṇvanspṛśañcighnannaśnagācchansvapañśvasan .. 8 ..
pralapanvisṛjanāṛhnanunmiṣannimiṣannapi .
indriyāṇīndriyārtheṣu vartanta iti dhārayan .. 9 ..


(देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, सोता, श्वास लेता, बोलता, त्याग करता, ग्रहण करता तथा आँखों को खोलता और मूँदता हुआ भी इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषय में बर्त रही हैं ऐसे समझकर) ऐसे माने कि ‘मैं कुछ भी नहीं करता।’ इस प्रकार इसका पहले के आधे श्लोक से सम्बन्ध है।

जो इस प्रकार तत्त्वज्ञानी है अर्थात् सब इन्द्रियाँ और अन्तःकरणों की चेष्टारूप कर्मों में अकर्म देखनेवाला है, वह अपने में कर्मों का अभाव देखता है, इसलिये उस यथार्थ ज्ञानी का सर्वकर्मसंन्यास में ही अधिकार है।

क्योंकि मृगतृष्णिका में जल समझकर उसको पीने के लिये प्रवृत्त हुआ मनुष्य उसमें जल के अभाव का ज्ञान हो जाने पर फिर भी वही जल पीने के लिये प्रवृत्त नहीं होता ॥ ८-९ ॥

परंतु जो तत्त्वज्ञानी नहीं है और कर्मयोग में लगा हुआ है (यानी)—

तात्पर्य पढ़ें

मन्येत इति पूर्वेण सम्बन्धः ।

यस्य एवं तत्त्वविदः सर्वकार्यकरण चेष्टासु कर्मसु अकर्म एव पश्यतः सम्यग्दर्शिनः तस्य सर्वकर्मसन्न्यासे एव अधिकारः कर्मणः अभाव-दर्शनात् ।

न हि मृगतृष्णिकायाम् उदकबुद्ध्या पानाय प्रवृत्त उदकाभावज्ञाने अपि तत्र एव पान-प्रयोजनाय प्रवर्तते ॥ ८-९ ॥

यः तु पुनः अतत्त्ववित् प्रवृत्तः च कर्मयोगे—