एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ १० ॥
yogī yuñjīta satatamātmānaṃ rahasi sthitaḥ .
ekākī yatacittātmā nirāśīraparigrahaḥ .. 10 ..
ध्यान करनेवाला योगी अकेला—किसीको साथ न लेकर पहाड़की गुफा आदि एकान्त स्थानमें स्थित हुआ, निरन्तर अपने अन्त:करणको ध्यानमें स्थिर किया करे।
‘एकान्त स्थानमें स्थित हुआ’ और ‘अकेला’ इन विशेषणों से यह भाव पाया जाता है कि संन्यास ग्रहण करके योगका साधन करे।
जिसका चित्त—अन्तःकरण और आत्मा—शरीर (दोनों) जीते हुए हैं ऐसा यतचित्तात्मा, निराशी—तृष्णाहीन और संग्रहरहित होकर अर्थात् संन्यासी होनेपर भी सब संग्रहका त्याग करके योगका अभ्यास करे ॥ १० ॥
योगाभ्यास करने वाले के लिये योग के साधनरूप आसन, आहार और विहार आदिका नियम बतलाना उचित है एवं योग को प्राप्त हुए पुरुषका लक्षण और उसका फल आदि भी कहना चाहिये। इसलिये अब (यह प्रकरण) आरम्भ किया जाता है। उसमें पहले आसनका ही वर्णन करते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
योगी ध्यायी युञ्जीत समादध्यात् सततं सर्वदा आत्मानम् अन्तःकरणं रहसि एकान्ते गिरिगुहादौ स्थितः सन् एकाकी असहायः।
रहसि स्थित एकाकी च इति विशेषणात्
सन्न्यासं कृत्वा इत्यर्थः ।
यतचित्तात्मा चित्तम् अन्तःकरणम् आत्मा देहः च संयतौ यस्य स यतचित्तात्मा निराशीः वीततृष्णः अपरिग्रहः च परिग्रहरहितः। संन्यासित्वे अपि त्यक्तसर्वपरिग्रहः सन् युञ्जीत इत्यर्थः ॥ १० ॥
अथ इदानीं योगं युञ्जत आसन आहार विहारादीनां योगसाधनत्वेन नियमो वक्तव्यः प्राप्तयोगलक्षणं यत्फलादि च इति अत आरभ्यते । तत्र आसनम् एव तावत् प्रथमम् उच्यते—