सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३ ॥
samaṃ kāyaśirogrīvaṃ dhārayannacalaṃ sthiraḥ .
samprekṣya nāsikāgraṃ svaṃ diśaścānavalokayan .. 13 ..
काया, सिर और गरदन को सम और अचल भावसे धारण करके स्थिर होकर बैठे। समानभावसे धारण किये हुए कायादिका भी चलन होना सम्भव है, इसलिये ‘अचलम्’ यह विशेषण दिया गया है।
तथा अपनी नासिकाके अग्रभागको देखता हुआ यानी मानो वह उधर ही अच्छी तरह देख रहा है। इस प्रकार दृष्टि करके।
यहाँ ‘संप्रेक्ष्य’ के साथ ‘इव’ शब्द लुप्त समझना चाहिये; क्योंकि यहाँ अपनी नासिकाके अग्रभागको देखनेका विधान करना अभिमत नहीं है।
तो क्या है? बस, नेत्रोंकी दृष्टिको (विषयोंकी ओरसे रोककर) वहाँ स्थापन करना ही इष्ट है।
वह (इस तरह दृष्टिस्थापना करना) भी अन्तःकरणके समाधानके लिये आवश्यक होनेके कारण भी अभीष्ट है। क्योंकि यदि अपनी नासिकाके अग्रभागको देखना ही विधेय माना जाय तो फिर मन वहीं स्थित होगा, आत्मामें नहीं।
परंतु (आगे चलकर) ‘आत्मसंस्थं मनः कृत्वा’ इस पदसे आत्मामें ही मन को स्थित करना बतलायेंगे। इसलिये ‘इव’ शब्दके लोपद्वारा नेत्रोंकी दृष्टिको नासिकाके अग्रभागपर लगाना ही ‘सम्प्रेक्ष्य’ इस पदसे कहा गया।
इस प्रकार (नेत्रोंकी दृष्टिको नासिकाके अग्रभाग-पर लगाकर) तथा अन्य दिशाओंको न देखता हुआ अर्थात् बीच-बीचमें दिशाओंकी ओर दृष्टि न डालता हुआ ॥ १३ ॥
तथा—
तात्पर्य पढ़ें
समं कायशिरोग्रीवं कायः च शिरः च ग्रीवा च कायशिरोग्रीवं तत् समं धारयन् अचलं च समं धारयतः चलनं सम्भवति अतो विशिनष्टि अचलम् इति। स्थिरः स्थिरो भूत्वा इत्यर्थः।
स्वं नासिकाग्रं सम्प्रेक्ष्य सम्यक् प्रेक्षणं
दर्शनं कृत्वा इव।
इति इवशब्दो लुप्तो द्रष्टव्यः । न हि
स्वनासिकाग्रसम्प्रेक्षणम् इह विधित्सितम् ।
किं तर्हि चक्षुषोः दृष्टिसन्निपातः।
स च अन्तःकरणसमाधानापेक्षो विविक्षितः
स्वनासिकाग्रसम्प्रेक्षणम् एव चेद् विवक्षितं मनः
तत्र एव समाधीयते न आत्मनि ।
आत्मनि हि मनसः समाधानं वक्ष्यति ‘आत्मसंस्थं मनः कृत्वा’ इति। तस्माद् इवशब्दलोपेन अक्ष्णोः दृष्टिसन्निपात एव सम्प्रेक्ष्य इति उच्यते।
दिशः च अनवलोकयन् दिशां च अवलोकनम्
अन्तरा अकुर्वन् इति एतत् ॥ १३ ॥