अध्याय 6 - श्लोक 14

किं च—
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ १४ ॥

kiṃ ca—
praśāntātmā vigatabhīrbrahmacārivrate sthitaḥ .
manaḥ saṃyamya maccitto yukta āsīta matparaḥ .. 14 ..


प्रशान्तात्मा—अच्छी प्रकारसे शान्त हुए अन्तः-करणवाला, विगतभी—निर्भय और ब्रह्मचारियोंके व्रतमें स्थित हुआ अर्थात् ब्रह्मचर्य, गुरुसेवा, भिक्षा-भोजन आदि जो ब्रह्मचारीके व्रत हैं उनमें स्थित हुआ उनका अनुष्ठान करनेवाला होकर और मनका संयम करके अर्थात् मनकी वृत्तियोंका उपसंहार करके तथा मुझमें चित्तवाला अर्थात् मुझ परमेश्वरमें ही जिसका चित्त लग गया है ऐसा मच्चित्त होकर तथा समाहितचित्त होकर और मुझे ही सर्वश्रेष्ठ माननेवाला, अर्थात् मैं ही जिसके मतमें सबसे श्रेष्ठ हूँ, ऐसा होकर बैठे।

कोई स्त्रीप्रेमी स्त्रीमें चित्तवाला हो सकता है; परंतु वह स्त्रीको सबसे श्रेष्ठ नहीं समझता। तो किसको समझता है? वह राजाको या महादेवको स्त्रीकी अपेक्षा श्रेष्ठ समझता है? परंतु यह साधक तो चित्त भी मुझमें ही रखता है और मुझे ही सबसे अधिक श्रेष्ठ भी समझता है ॥ १४ ॥

अब योगका फल कहा जाता है—

तात्पर्य पढ़ें

प्रशान्तात्मा प्रकर्षेण शान्त आत्मा अन्तःकरणं यस्य सः अयं प्रशान्तात्मा विगतभीः विगतभयो ब्रह्मचारिव्रते स्थितो ब्रह्मचारिणो व्रतं ब्रह्मचर्यं गुरुशुश्रूषाभिक्षाभुक्त्यादि तस्मिन् स्थितः तदनुष्ठाता भवेद् इत्यर्थः । किं च मनः संयम्य मनसो वृत्तिः उपसंहृत्य इति एतद् मच्चित्तो मयि परमेश्वरे चित्तं यस्य सः अयं मच्चित्तो युक्तः समाहितः सन् आसीत उपविशेद् मत्परः अहं परो यस्य सः अयं मत्परः ।

भवति कश्चिद् रागी स्त्रीचित्तो न तु स्त्रियम्

एव परत्वेन गृह्णाति, किं तर्हि राजानं महादेवं

वा अयं तु मच्चित्तो मत्परः च ॥ १४ ॥

अथ इदानीं योगफलम् उच्यते—