न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २ ॥
yaṃ sannyāsamiti prāhuryogaṃ taṃ viddhi pāṇḍava .
na hyasannyastasaṅkalpo yogī bhavati kaścana .. 2 ..
श्रुति-स्मृतिके ज्ञाता पुरुष सर्वकर्म और उनके फलके त्यागरूप जिस भावको वास्तविक संन्यास कहते हैं, हे पाण्डव! कर्मानुष्ठानरूप योगको (निष्काम कर्मयोगको) भी तू वही वास्तविक संन्यास जान।
प्रवृत्तिरूप कर्मयोगकी उससे विपरीत निवृत्तिरूप परमार्थ-संन्यासके साथ कैसी समानता स्वीकार करके एकता कही जाती है? ऐसा प्रश्न होनेपर यह कहा जाता है—
परमार्थ-संन्यासके साथ कर्मयोगकी कर्तृविषयक समानता है; क्योंकि जो परमार्थ-संन्यासी है वह सब कर्मसाधनोंका त्याग कर चुकता है, इसलिये सब कर्मोंका और उनके फलविषयक संकल्पोंका, जो कि प्रवृत्तिहेतुक कामके कारण हैं, त्याग करता है। और यह कर्मयोगी भी कर्म करता हुआ फलविषयक संकल्पोंका त्याग करता ही है (इस प्रकार दोनोंकी समानता है), इस अभिप्रायको दिखलाते हुए कहते हैं—
जिसने फलविषयक संकल्पोंका यानी इच्छाओंका त्याग न किया हो, ऐसा कोई भी कर्मी, योगी नहीं हो सकता। अर्थात् ऐसे पुरुषका चित्त समाधिस्थ होना सम्भव नहीं है; क्योंकि फलका संकल्प ही चित्तके विक्षेपका कारण है।
इसलिये जो कोई कर्मी फलविषयक संकल्पोंका त्याग कर देता है वही योगी होता है। अभिप्राय यह है कि चित्तविक्षेपका कारण जो फलविषयक संकल्प है उसके त्यागसे ही मनुष्य समाधानयुक्त यानी चित्तविक्षेपसे रहित योगी होता है।
इस प्रकार परमार्थ-संन्यासकी और कर्मयोगकी कर्त्ताके भावसे सम्बन्ध रखनेवाली जो त्यागविषयक समानता है, उसकी अपेक्षासे ही कर्मयोगकी स्तुति करनेके लिये ‘यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव’ इस श्लोकमें उसे संन्यास बतलाया है ॥ २ ॥
फलेच्छासे रहित जो कर्मयोग है वह ध्यानयोगका बहिरंग साधन है, इस उद्देश्यसे उसकी संन्यासरूपसे स्तुति करके अब यह भाव दिखलाते हैं कि कर्मयोग ध्यानयोगका साधन है—
तात्पर्य पढ़ें
यं सर्वकर्मतत्फलपरित्यागलक्षणं परमार्थ-सन्न्यासम् इति प्राहुः श्रुतिस्मृतिविदः, योगं कर्मानुष्ठानलक्षणं तं परमार्थसन्न्यासं विद्धि जानीहि हे पाण्डव।
कर्मयोगस्य प्रवृत्तिलक्षणस्य तद्विपरीतेन निवृत्तिलक्षणेन परमार्थसन्न्यासेन कीदृशं सामान्यम् अङ्गीकृत्य तद्भाव उच्यते इति अपेक्षायाम् इदम् उच्यते—
अस्ति परमार्थसन्न्यासेन सादृश्यं कर्तृद्वारकं कर्मयोगस्य। यो हि परमार्थसन्न्यासी स त्यक्त-सर्वकर्मसाधनतया सर्वकर्मतत्फलविषयं सङ्कल्पं प्रवृत्तिहेतुकामकारणं सन्न्यस्यति। अयम् अपि कर्मयोगी कर्म कुर्वाण एव फलविषयं सङ्कल्प सन्न्यस्यति इति एतम् अर्थं दर्शयन् आह—
न हि यस्माद् असन्न्यस्तसङ्कल्पः असन्न्यस्तः अपरित्यक्तः फलविषयः सङ्कल्पः अभिसन्धिः येन सः असन्न्यस्तसङ्कल्पः, कश्चन कश्चिद् अपि कर्मी योगी समाधानवान् भवति, न सम्भवति इत्यर्थः। फलसङ्कल्पस्य चित्तविक्षेपहेतुत्वात्।
तस्माद् यः कश्चन कर्मी सन्न्यस्तफलसङ्कल्पो भवेत् स योगी समाधानवान् अविक्षिप्तचित्तो भवेत् चित्तविक्षेपहेतोः फलसङ्कल्पस्य सन्न्यस्त-त्वाद् इति अभिप्रायः।
एवं परमार्थसन्न्यासकर्मयोगयोः कर्तृद्वारकं सन्न्याससामान्यम् अपेक्ष्य ‘यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव’ इति कर्मयोगस्य स्तुत्यर्थं सन्न्यासत्वम् उक्तम् ॥ २ ॥
ध्यानयोगस्य फलनिरपेक्षः कर्मयोगो बहिरङ्गं साधनम् इति तं सन्न्यासत्वेन स्तुत्वा अधुना कर्मयोगस्य ध्यानयोगसाधनत्वं दर्शयति—