सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८ ॥
yuñjannevaṃ sadātmānaṃ yogī vigatakalmaṣaḥ .
sukhena brahmasaṃsparśamatyantaṃ sukhamaśnute .. 28 ..
योगविषयक विघ्नोंसे रहित हुआ विगतकल्मष निष्पाप योगी उपर्युक्त क्रमसे सदा चित्तको समाहित करता हुआ, अनायास ही ब्रह्मप्राप्तिरूप निरतिशय—उत्कृष्ट सुखका अनुभव करता है अर्थात् जिसका परब्रह्मसे सम्बन्ध है और जो अन्तसे अतीत—अनन्त है ऐसे परम सुखको प्राप्त हो जाता है ॥ २८ ॥
अब, योगका फल जो कि समस्त संसारका विच्छेद करा देनेवाला ब्रह्मके साथ एकताका देखना है वह दिखलाया जाता है—
तात्पर्य पढ़ें
युञ्जन् एवं यथोक्तेन क्रमेण योगी योगान्त- रायवर्जितः सदा आत्मानं विगतकल्मषो विगत- पापः सुखेन अनायासेन ब्रह्मसंस्पर्शं ब्रह्मणा परेण संस्पर्शो यस्य तद् ब्रह्मसंस्पर्शं सुखम् अत्यन्तम् अन्तम् अतीत्य वर्तते इति अत्यन्तम् उत्कृष्टं निरतिशयम् अश्नुते व्याप्नोति ॥ २८ ॥
इदानीं योगस्य यत् फलं ब्रह्मैकत्वदर्शनं सर्वसंसारविच्छेदकारणं तत् प्रदर्श्यते—