अध्याय 6 - श्लोक 29

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा
सर्वत्रसमदर्शनः ॥ २९ ॥

sarvabhūtasthamātmānaṃ sarvabhūtāni cātmani .
īkṣate yogayuktātmā
sarvatrasamadarśanaḥ .. 29 ..


समाहित अन्तःकरण से युक्त और सब जगह समदृष्टिवाला योगी—जिसका ब्रह्म और आत्मा की एकता को विषय करनेवाला ज्ञान, ब्रह्मा से लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त विभक्त प्राणियों में भेदभाव से रहित—सम हो चुका है, ऐसा पुरुष—अपने आत्मा को सब भूतों में स्थित (देखता है) और आत्मा में सब भूतों को देखता है। अर्थात् ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त प्राणियों को आत्मा में एकता को प्राप्त हुए देखता है ॥ २९ ॥

इस आत्मा की एकता के दर्शन का फल कहा जाता है—

तात्पर्य पढ़ें

सर्वभूतस्थं सर्वेषु भूतेषु स्थितं स्वम् आत्मानं सर्वभूतानि च आत्मनि ब्रह्मादीनि स्तम्बपर्यन्तानि च सर्वभूतानि आत्मनि एकतां गतानि ईक्षते पश्यति योगयुक्तात्मा समाहितान्तःकरणः सर्वत्र-समदर्शनः सर्वेषु ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु विषमेषु सर्वभूतेषु समं निर्विशेषं ब्रह्मात्मैकत्वविषयं दर्शनं ज्ञानं यस्य स सर्वत्रसमदर्शनः ॥ २९ ॥

एतस्य आत्मैकत्वदर्शनस्य फलम् उच्यते—