सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१ ॥
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१ ॥
sarvabhūtasthitaṃ yo māṃ bhajatyekatvamāsthitaḥ .
sarvathā vartamāno’pi sa yogī mayi vartate .. 31 ..
(एकत्व भाव में स्थित हुआ जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में स्थित मुझ वासुदेव को भजता है) इस प्रकार पहले श्लोक के अर्थरूप यथार्थ ज्ञान का इस आधे श्लोक से अनुवाद करके उसके फलस्वरूप मोक्ष का विधान करते हैं। वह पूर्ण ज्ञानी—योगी सब प्रकार से बर्तता हुआ भी वैष्णव परमपदरूप मुझ परमेश्वर में ही बर्तता है अर्थात् वह सदा मुक्त ही है—उसके मोक्ष को कोई भी रोक नहीं सकता ॥ ३१ ॥
तथा और भी कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
इति एतत् पूर्वश्लोकार्थं सम्यग्दर्शनम् अनूद्य तत्फलं मोक्षः अभिधीयते । सर्वथा सर्वप्रकारैः वर्तमानः अपि सम्यग्दर्शी योगी मयि वैष्णवे परमे पदे वर्तते नित्यमुक्त एव स न मोक्षं प्रति केनचित् प्रतिबध्यते इत्यर्थः ॥ ३१ ॥
किं च अन्यत्—