सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२ ॥
ātmaupamyena sarvatra samaṃ paśyati yo’rjuna.
sukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃ sa yogī paramo mataḥ .. 32 ..
आत्मा अर्थात् स्वयं आप और जिसके द्वारा उपमित किया जाय वह उपमा, उस उपमाके भावको (सादृश्यको) औपम्य कहते हैं।
हे अर्जुन ! उस आत्मौपम्य द्वारा अर्थात् अपनी सदृशतासे जो योगी सर्वत्र—सब भूतोंमें तुल्य देखता है।
वह तुल्य क्या देखता है? सो कहते हैं—
जैसे मुझे सुख प्रिय है वैसे ही सभी प्राणियोंको सुख अनुकूल है और जैसे दुःख मुझे अप्रिय—प्रतिकूल है वैसे ही वह सब प्राणियोंको अप्रिय—प्रतिकूल है। इस प्रकार जो सब प्राणियोंमें अपने समान ही सुख और दुःखको तुल्यभावसे अनुकूल और प्रतिकूल देखता है, किसीके भी प्रतिकूल आचरण नहीं करता, यानी अहिंसक है। यहाँ ‘वा’ शब्दका प्रयोग ‘च’ के अर्थमें हुआ है।
जो इस प्रकारका अहिंसक पुरुष पूर्ण ज्ञानमें स्थित है वह योगी अन्य सब योगियोंमें परम उत्कृष्ट माना जाता है ॥ ३२ ॥
इस उपर्युक्त पूर्णज्ञानरूप योगको कठिनतासे सम्पादन किया जानेयोग्य समझकर उसकी प्राप्तिके निश्चित उपायको सुनने की इच्छावाले अर्जुन बोले—
तात्पर्य पढ़ें
आत्मौपम्येन आत्मा स्वयम् एव उपमीयते [अनया] इति उपमा तस्या उपमाया भाव औपम्यम् ।
तेन आत्मौपम्येन सर्वत्र सर्वभूतेषु समं तुल्यं पश्यति यः अर्जुन।
स च किं समं पश्यति इति उच्यते—
यथा मम सुखम् इष्टं तथा सर्वप्राणिनां सुखम् अनुकूलम् । वा शब्दः चार्थे । यदि वा यत् च दुःखं मम प्रतिकूलम् अनिष्टं यथा तथा सर्वप्राणिनां दुःखम् अनिष्टं प्रतिकूलम् इति एवम् आत्मौपम्येन सुखदुःखे अनुकूलप्रतिकूले तुल्यतया सर्वभूतेषु समं पश्यति, न कस्यचित् प्रतिकूलम् आचरति अहिंसक इत्यर्थः ।
य एवम् अहिंसकः सम्यग्दर्शननिष्ठः स योगी परम उत्कृष्टो मतः अभिप्रेतः सर्वयोगिनां मध्ये ॥ ३२ ॥
एतस्य यथोक्तस्य सम्यग्दर्शनलक्षणस्य योगस्य दुःखसम्पाद्यताम् आलक्ष्य शुश्रूषुः ध्रुवं तत्प्राप्ति उपायम्—