वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥ ३६ ॥
asaṃyatātmanā yogo duṣprāpa iti me matiḥ .
vaśyātmanā tu yatatā śakyo’vāptumupāyataḥ .. 36 ..
मन को वश में न करनेवाले पुरुषद्वारा अर्थात् जिसका अन्त:करण अभ्यास और वैराग्यद्वारा संयत किया हुआ नहीं है ऐसे पुरुषद्वारा योग प्राप्त किया जाना कठिन है, अर्थात् उसको योग कठिनता से प्राप्त हो सकता है—यह मेरा निश्चय है।
परंतु जो स्वाधीन मन वाला है—जिसका मन अभ्यास-वैराग्यद्वारा वश में किया हुआ है और जो फिर भी बारंबार यत्न करता ही जाता है ऐसे पुरुषद्वारा पूर्वोक्त उपायों से यह योग प्राप्त किया जा सकता है ॥ ३६ ॥
योगाभ्यास को स्वीकार करके जिसने इस लोक और परलोक की प्राप्तिके साधनरूप कर्मोंका तो त्याग कर दिया और योगसिद्धिका फल, मोक्षप्राप्ति का साधन पूर्ण ज्ञान जिसको मिला नहीं, ऐसे जिस योगीका चित्त अन्तकालमें योगमार्गसे विचलित हो गया हो, उस योगीके नाशकी आशङ्का करके अर्जुन पूछने लगे—
तात्पर्य पढ़ें
असंयतात्मना अभ्यासवैराग्याभ्याम् असंयत आत्मा अन्तःकरणं यस्य सः अयम् असंयतात्मा तेन असंयतात्मना योगो दुष्प्रापः दुःखेन प्राप्यते इति मे मतिः ।
यः तु पुनः वश्यात्मा अभ्यासवैराग्याभ्यां वश्यत्वम् आपादित आत्मा मनो यस्य सः अयं वश्यात्मा तेन वश्यात्मना तु यतता भूयः अपि प्रयत्नं कुर्वता शक्यः अवाप्तुं योग उपायतो यथोक्ताद् उपायात् ॥ ३६ ॥
तत्र योगाभ्यासाङ्गीकरणेन परलोकेहलोक-प्राप्तिनिमित्तानि कर्माणि सन्न्यस्तानि योगसिद्धिफलं च मोक्षसाधनं सम्यग्दर्शनं न प्राप्तम् इति योगी योगमार्गाद् मरणकाले चलितचित्त इति तस्य नाशम् आशङ्क्य—