न कर्मस्वनुषज्जते ।
योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४ ॥
yadā hi nendriyārtheṣu sarvasaṅkalpasannyāsī
na karmasvanuṣajjate .
yogārūḍhastadocyate .. 4 ..
चित्तका समाधान कर लेनेवाला योगी जब इन्द्रियों के अर्थों में, अर्थात् इन्द्रियों के विषय जो शब्दादि हैं उनमें एवं नित्य, नैमित्तिक, काम्य और निषिद्ध कर्मों में अपना कुछ भी प्रयोजन न देखकर आसक्त नहीं होता, उनमें आसक्ति यानी ये मुझे करने चाहिये ऐसी बुद्धि नहीं करता।
तब—उस समय वह सब संकल्पों का त्यागी अर्थात् इस लोक और परलोक के भोगों की कामना के कारणरूप सब संकल्पों का त्याग करना जिसका स्वभाव हो चुका है, ऐसा पुरुष, योगारूढ़ यानी योग को प्राप्त हो चुका है, ऐसे कहा जाता है।
‘सर्वसङ्कल्पसंन्यासी’ इस कथन का यह आशय है कि सब कामनाओं को और समस्त कर्मों को छोड़ देना चाहिये।
क्योंकि सब कामनाओं का मूल संकल्प ही है। स्मृति में भी कहा है कि—‘काम का मूल कारण संकल्प ही है। समस्त यज्ञ संकल्प से उत्पन्न होते हैं।’ ‘हे काम! मैं तेरे मूल कारण को जानता हूँ। तू निःसन्देह संकल्प से ही उत्पन्न होता है। मैं तेरा संकल्प नहीं करूँगा, अतः फिर तू मुझे प्राप्त नहीं होगा।’
सब कामनाओं के परित्याग से ही सर्व कर्मों का त्याग सिद्ध हो जाता है। यह बात ‘वह जैसी कामनावाला होता है वैसे ही निश्चयवाला होता है, जैसे निश्चयवाला होता है वही कर्म करता है’ इत्यादि श्रुति से प्रमाणित है और ‘जीव जो-जो कर्म करता है वह सब काम की ही चेष्टा है।’ इत्यादि स्मृति से भी प्रमाणित है।
युक्ति से भी यही बात सिद्ध होती है; क्योंकि सब संकल्पों का त्याग कर देने पर तो कोई जरा-सा हिल भी नहीं सकता।
सुतरां ‘सर्वसङ्कल्पसंन्यासी’ कहकर भगवान् समस्त कामनाओं का और समस्त कर्मों का त्याग कराते हैं ॥ ४ ॥
जब मनुष्य इस प्रकार योगारूढ़ हो जाता है तब वह अनर्थों के समूह इस संसारसमुद्र से स्वयं अपना उद्धार कर लेता है, इसलिये—
तात्पर्य पढ़ें
यदा समाधीयमानचित्तो योगी हि इन्द्रियार्थेषु इन्द्रियाणाम् अर्थाः शब्दादयः तेषु इन्द्रियार्थेषु कर्मसु च नित्यनैमित्तिककाम्यप्रतिषिद्धेषु प्रयोजनाभावबुद्ध्या न अनुषज्जते अनुषङ्गं कर्तव्यताबुद्धिं न करोति इत्यर्थः ।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी सर्वान् सङ्कल्पान् इहा- मुत्रार्थकामहेतून् संन्यसितुं शीलम् अस्य इति सर्वसङ्कल्पसंन्यासी, योगारूढः प्राप्तयोग इति एतत् तदा तस्मिन् काले उच्यते।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी इति वचनात् सर्वान् च कामान् सर्वाणि च कर्माणि संन्यसेद् इत्यर्थः ।
सङ्कल्पमूला हि सर्वे कामाः—
‘सङ्कल्पमूलः कामो वै यज्ञाः सङ्कल्पसम्भवाः।’ (मनु० २।३)
‘काम जानामि ते मूलं सङ्कल्पात् किल जायसे ॥’ ‘न त्वां सङ्कल्पयिष्यामि समूलो न भविष्यसि ॥’ (महा० शान्ति० १७७। २५) इत्यादिस्मृतेः ।
सर्वकामपरित्यागे च सर्वकर्मसंन्यासः सिद्धो भवति ‘स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते’ (बृ० उ० ४।४।५) इत्यादिश्रुतिभ्यः ‘यद्यद्धि कुरुते कर्म तत्तत्कामस्य चेष्टितम्’ (मनु० २।४) इत्यादिस्मृतिभ्यः च।
न्यायात् च । न हि सर्वसङ्कल्पसंन्यासे कश्चित्
स्पन्दितुम् अपि शक्तः ।
तस्मात् सर्वसङ्कल्पसंन्यासी इति वचनात् सर्वान् कामान् सर्वाणि कर्माणि च त्याजयति भगवान् ॥ ४ ॥
यदा एवं योगारूढः तदा तेन आत्मा आत्मना उद्धृतो भवति संसाराद् अनर्थव्राताद् अतः—