अध्याय 6 - श्लोक 40

श्रीभगवानुवाच—
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥ ४० ॥

śrībhagavānuvāca—
pārtha naiveha nāmutra vināśastasya vidyate.
na hi kalyāṇakṛtkaściddurgatiṃ tāta gacchati.. 40 ..


हे पार्थ! उस योगभ्रष्ट पुरुष का इस लोकमें या परलोकमें कहीं भी नाश नहीं होता है। पहलेकी अपेक्षा हीन-जन्मकी प्राप्तिका नाम नाश है सो ऐसी अवस्था योगभ्रष्ट की नहीं होती।

क्योंकि हे तात! शुभ कार्य करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को अर्थात् नीच गति को नहीं पाता। पिता पुत्ररूपसे आत्माका विस्तार करता है, अतः उसको ‘तात’ कहते हैं तथा पिता ही पुत्ररूपसे उत्पन्न होता है अतः पुत्र को भी ‘तात’ कहते हैं। शिष्य भी पुत्र के तुल्य है इसलिये उसको भी ‘तात’ कहते हैं ॥ ४० ॥

तो फिर इस योगभ्रष्टका क्या होता है?—

तात्पर्य पढ़ें

हे पार्थ न एव इह लोके न अमुत्र परस्मिन् वा लोके विनाशः तस्य विद्यते, न अस्ति नाशो नाम पूर्वस्माद् हीनजन्मप्राप्तिः स योगभ्रष्टस्य न अस्ति।

न हि यस्मात् कल्याणकृत् शुभकृत् कश्चिद् दुर्गतिं कुत्सितां गतिं हे तात तनोति आत्मानं पुत्ररूपेण इति पिता तात उच्यते, पिता एव पुत्र इति पुत्रः अपि तात उच्यते शिष्यः अपि पुत्र उच्यते, गच्छति ॥ ४० ॥

किं तु अस्य भवति—