अध्याय 6 - श्लोक 43

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥ ४३ ॥

tatra taṃ buddhisaṃyogaṃ labhate paurvadehikam .
yatate ca tato bhūyaḥ saṃsiddhau kurunandana .. 43 ..


वहाँ योगियों के कुल में पहले शरीर में होने वाले उस बुद्धिके संयोगको पाता है—अर्थात् योगी-कुल में जन्म लेते ही उसका पूर्वजन्म में प्राप्त हुई बुद्धिसे सम्बन्ध हो जाता है और हे कुरुनन्दन! वह उस पूर्वकृत संस्कार के बलसे पूर्ण सिद्धि प्राप्त करने के लिये फिर और भी अधिक प्रयत्न करता है ॥ ४३ ॥

पहले शरीर की बुद्धिसे उसका संयोग कैसे होता है ? सो कहते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

तत्र योगिनां कुले तं बुद्धिसंयोगं बुद्ध्या संयोगं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकं पूर्वस्मिन् देहे भवं पौर्वदेहिकम्, यतते च प्रयत्नं करोति ततः तस्मात् पूर्वकृतात् संस्काराद् भूयो बहुतरं संसिद्धौ संसिद्धिनिमित्तं हे कुरुनन्दन ॥ ४३ ॥

कथं पूर्वदेहबुद्धिसंयोग इति तद् उच्यते—