जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥ ४४ ॥
pūrvābhyāsena tenaiva hriyate hyavaśo’pi saḥ .
jijñāsurapi yogasya śabdabrahmātivartate .. 44 ..
क्योंकि वह योगभ्रष्ट पुरुष परवश हुआ भी पूर्वाभ्यासके द्वारा अर्थात् जो पहले जन्ममें किया हुआ अभ्यास है, उस अति बलवान् पूर्वाभ्यासके द्वारा योग की ओर खींच लिया जाता है।
यदि योगाभ्यासके संस्कारोंकी अपेक्षा अधिक बलवान् अधर्मादि कर्म न किये हों तो वह योगाभ्यास जनित संस्कारोंसे खिंच जाता है और यदि अधिक बलवान् अधर्म किया हुआ होता है तो उससे योगजन्य संस्कार भी दब ही जाते हैं।
परंतु उस पाप कर्म का क्षय होनेपर योगजन्य संस्कार स्वयं ही अपना कार्य आरम्भ कर देता है। बहुत कालतक दबे रहनेपर भी उसका नाश नहीं होता।
जो योगका जिज्ञासु भी है अर्थात् जो योग के स्वरूपको जाननेकी इच्छा करके योगमार्ग में लगा हुआ योगभ्रष्ट संन्यासी है वह भी शब्दब्रह्म को अर्थात् वेदमें कहे हुए कर्मफलको अतिक्रम कर जाता है, फिर जो योगको जानकर उसमें स्थित हुआ अभ्यास करता है उसका तो कहना ही क्या है। यहाँ प्रसंग की शक्तिसे जिज्ञासु का अर्थ संन्यासी किया गया है ॥ ४४ ॥
योगित्व श्रेष्ठ किस कारणसे है?—
तात्पर्य पढ़ें
यः पूर्वजन्मनि कृतः अभ्यासः स पूर्वाभ्यासः तेन एव बलवता ह्रियते हि यस्माद् अवशः अपि स योगभ्रष्टः ।
न कृतं चेद् योगाभ्याससंस्काराद् बलवत्तरम् अधर्मादिलक्षणं कर्म तदा योगाभ्यासजनितेन संस्कारेण ह्रियते। अधर्मः चेद् बलवत्तरः कृतः तेन योगजः अपि संस्कारः अभिभूयते एव।
तत्क्षये तु योगजः संस्कारः स्वयम् एव कार्यम् आरभते, न दीर्घकालस्थस्य अपि विनाशः तस्य अस्ति इत्यर्थः ।
जिज्ञासुः अपि योगस्य स्वरूपं ज्ञातुम् इच्छन् योगमार्गे प्रवृत्तः सन्न्यासी योगभ्रष्टः सामर्थ्यात् सः अपि शब्दब्रह्म वेदोक्तकर्मानुष्ठानफलम् अतिवर्तते अपाकरिष्यति किम् उत बुद्ध्वा यो योगं तन्निष्ठः अभ्यासं कुर्यात् ॥ ४४ ॥
कुतः च योगित्वं श्रेय इति—