अध्याय 6 - श्लोक 5

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो
बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५ ॥

uddharedātmanātmānaṃ nātmānamavasādayet .
ātmaiva hyātmano
bandhurātmaiva ripurātmanaḥ .. 5 ..


संसार-सागरमें डूबे पड़े हुए अपने-आपको उस संसारसमुद्रसे आत्मबलके द्वारा ऊँचा उठा लेना चाहिये अर्थात् योगारूढ अवस्थाको प्राप्त कर लेना चाहिये।

अपना अधःपतन नहीं करना चाहिये अर्थात् अपने आत्माको नीचे नहीं गिरने देना चाहिये।

क्योंकि यह आप ही अपना बन्धु है। दूसरा कोई (ऐसा) बन्धु नहीं है जो संसारसे मुक्त करनेवाला हो। प्रेमादि भाव बन्धनके स्थान होनेके कारण सांसारिक बन्धु भी (वास्तवमें) मोक्षमार्गका तो विरोधी ही होता है। इसलिये निश्चयपूर्वक यह कहना ठीक ही है कि आप ही अपना बन्धु है।

तथा आप ही अपना शत्रु है। जो कोई दूसरा अनिष्ट करनेवाला बाह्य शत्रु है वह भी अपना ही बनाया हुआ होता है, इसलिये आप ही अपना शत्रु है, इस प्रकार केवल अपनेको ही शत्रु बतलाना भी ठीक ही है ॥ ५ ॥

आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है यह बात कही गयी, उसमें किन लक्षणोंवाला पुरुष तो (आप ही) अपना मित्र होता है और कौन (आप ही) अपना शत्रु होता है? सो कहा जाता है—

तात्पर्य पढ़ें

उद्धरेत् संसारसागरे निमग्नम् आत्मना आत्मानं तत उद् ऊर्ध्वं हरेद् उद्धरेद् योगारूढतां आपादयेद् इत्यर्थः ।

न आत्मानम् अवसादयेद् न अधो नयेद् न अधो गमयेत्।

आत्मा एव हि यस्माद् आत्मनो बन्धुः । न हि अन्यः कश्चिद् बन्धुः यः संसारमुक्तये भवति । बन्धुः अपि तावद् मोक्षं प्रति प्रतिकूल एव स्नेहादिबन्धनायतनत्वाद् तस्माद् युक्तम् अवधारणम् ‘आत्मा एव हि आत्मनो बन्धुः’ इति ।

आत्मा एव रिपुः शत्रुः यः अन्यः अपकारी बाह्यः शत्रुः सः अपि आत्मप्रयुक्त एव इति, युक्तम् एव अवधारणम् आत्मा एव रिपुः आत्मन इति ॥ ५ ॥

आत्मा एव बन्धुः आत्मा एव रिपुः आत्मन इति उक्तम्, तत्र किंलक्षण आत्मनो बन्धुः किंलक्षणो वा आत्मनो रिपुः इति उच्यते—