अध्याय 7 - श्लोक 1

श्रीभगवानुवाच—
मध्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १ ॥

śrībhagavānuvāca—
madhyāsaktamanāḥ pārtha yogaṃ yuñjanmadāśrayaḥ .
asaṃśayaṃ samagraṃ māṃ yathā jñāsyasi tacchṛṇu .. 1 ..


आगे कहे जानेवाले विशेषणों से युक्त मुझ परमेश्वर- में ही जिसका मन आसक्त हो, वह ‘मय्यासक्तमना’ है और मैं परमेश्वर ही जिसका (एकमात्र) अवलम्बन हूँ वह ‘मदाश्रय’ है, हे पार्थ ! ऐसा ‘मय्यासक्तमना’ और ‘मदाश्रय’ होकर तू योग का साधन करता हुआ अर्थात् मन को ध्यान में स्थित करता हुआ (जिस प्रकार मुझको संशयरहित समग्ररूप से जानेगा सो सुन—)

जो कोई (धर्मादि पुरुषार्थों में से) किसी पुरुषार्थ का चाहनेवाला होता है, वह उसके साधनरूप अग्निहोत्रादि कर्म, तप या दानरूप किसी एक आश्रय को ग्रहण किया करता है, परंतु यह योगी तो अन्य साधनों को छोड़कर केवल मुझको ही आश्रयरूप से ग्रहण करता है और मुझ में ही आसक्तचित्त होता है।

इसलिये तू उपर्युक्त गुणों से सम्पन्न होकर विभूति, बल, ऐश्वर्य आदि गुणों से सम्पन्न मुझ समग्र परमेश्वर को जिस प्रकार संशयरहित जानेगा कि ‘भगवान् निस्सन्देह ठीक ऐसा ही है,’ वह प्रकार मैं तुझसे कहता हूँ, सुन ॥ १ ॥

वहीं यह अपने स्वरूप का—

तात्पर्य पढ़ें

युञ्जन् मनःसमाधानं कुर्वन् मदाश्रयः अहम् एव परमेश्वर आश्रयो यस्य स मदाश्रयः।

यो हि कश्चित् पुरुषार्थेन केनचिद् अर्थी भवति स तत्साधनं कर्म अग्निहोत्रादि तपो दानं वा किञ्चिद् आश्रयं प्रतिपद्यते। अयं तु योगी माम् एव आश्रयं प्रतिपद्यते हित्वा अन्यत् साधनान्तरं मयि एव आसक्तमना भवति।

यः त्वम् एवम्भूतः सन् असंशयं समग्रं समस्तं विभूतिबलशक्त्यैश्वर्यादिगुणसम्पन्नं मां यथा येन प्रकारेण ज्ञास्यसि संशयम् अन्तरेण एवम् एव भगवान् इति तत् शृणु उच्यमानं मया ॥ १ ॥

तत् च मद्विषयम्—