धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥
balaṃ balavatāṃ cāhaṃ kāmarāgavivarjitam .
dharmāviruddho bhūteṣu kāmo’smi bharatarṣabha .. 11 ..
बलवानों का जो कामना और आसक्ति से रहित बल—ओज-सामर्थ्य है, वह मैं हूँ।
(अभिप्राय यह कि) अप्राप्त विषयों की जो तृष्णा है, उसका नाम ‘काम’ है और प्राप्त विषयों में जो प्रीति—तन्मयता है, उसका नाम ‘राग’ है, उन दोनों से रहित, केवल देह आदिको धारण करने के लिये जो बल है, वह मैं हूँ। जो संसारी जीवों का बल कामना और आसक्ति का कारण है, वह मैं नहीं हूँ।
तथा हे भरतश्रेष्ठ ! प्राणियों में जो धर्म से अविरुद्ध शास्त्रानुकूल कामना है, जैसे देहधारणमात्र के लिये खाने-पीने की इच्छा आदि, वह (इच्छारूप) काम भी मैं ही हूँ ॥ ११ ॥
तात्पर्य पढ़ें
बलं सामर्थ्यम् ओजो बलवताम् अहम् । तत् बलं च कामरागविवर्जितम् ।
कामः च रागः च कामरागौ कामः तृष्णा असन्निकृष्टेषु विषयेषु रागो रञ्जना प्राप्तेषु विषयेषु ताभ्यां विवर्जितं देहादिधारणमात्रार्थं बलम् अहम् अस्मि, न तु यत् संसारिणां तृष्णारागकारणम् ।
किं च धर्माविरुद्धो धर्मेण शास्त्रार्थेन अविरुद्धो यः प्राणिषु भूतेषु कामो यथा देहधारण-मात्राद्यर्थः अशनपानादि विषयः कामः अस्मि हे भरतर्षभ ॥ ११ ॥