ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥ १२ ॥
kiṃ ca—
ye caiva sāttvikā bhāvā rājasāstāmasāśca ye.
matta eveti tānviddhi na tvahaṃ teṣu te mayi.. 12 ..
जो सात्त्विक—सत्त्वगुणसे उत्पन्न हुए भाव—पदार्थ हैं और जो राजस—रजोगुणसे उत्पन्न हुए एवं तामस—तमोगुणसे उत्पन्न हुए भाव—पदार्थ हैं, उन सबको अर्थात् प्राणियों के अपने कर्मानुसार ये जो कुछ भी भाव उत्पन्न होते हैं उन सबको तू मुझसे ही उत्पन्न हुए जान।
यद्यपि वे मुझसे उत्पन्न होते हैं तथापि मैं उनमें नहीं हूँ अर्थात् संसारी मनुष्योंकी भाँति मैं उनके वशमें नहीं हूँ, परंतु वे मुझमें हैं यानी मेरे वशमें हैं—मेरे अधीन हैं ॥ १२ ॥
ऐसा जो साक्षात् परमेश्वर नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव एवं सब भूतोंका आत्मा गुणोंसे अतीत और संसाररूप दोषके बीजको भस्म करनेवाला मैं हूँ,उसको जगत् नहीं पहचानता! इस प्रकार भगवान् खेद प्रकट करते हैं और जगत् का यह अज्ञान किस कारण से है, सो बतलाते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
ये च एव सात्त्विकाः सत्त्वनिर्वृता भावाः पदार्था राजसा रजोनिर्वृताः तामसाः तमोनिर्वृताः च ये केचित् प्राणिनां स्वकर्मवशाद् जायन्ते भावाः तान् मत्त एव जायमानान् इति एवं विद्धि सर्वान् समस्तान् एव।
यद्यपि ते मत्तो जायन्ते तथापि न तु अहं तेषु तदधीनः तद्वशो यथा संसारिणः ते पुनः मयि मद्वशा मदधीनाः ॥ १२ ॥
एवं भूतम् अपि परमेश्वरं नित्यशुद्धबुद्धमुक्त-स्वभावं सर्वभूतात्मानं निर्गुणं संसारदोषबीज-प्रदाहकारणं मां न अभिजानाति जगद् इति अनुक्रोशं दर्शयति भगवान्। तत् च किं निमित्तं जगतः अज्ञानम् इति उच्यते—