मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४ ॥
daivī hyeṣā guṇamayī mama māyā duratyayā .
māmeva ye prapadyante māyāmetāṃ taranti te .. 14 ..
क्योंकि यह उपर्युक्त दैवी माया अर्थात् मुझ व्यापक ईश्वरकी निज शक्ति मेरी त्रिगुणमयी माया दुस्तर है अर्थात् जिससे पार होना बड़ा कठिन है, ऐसी है। इसलिये जो सब धर्मोंको छोड़कर अपने ही आत्मा मुझ मायापति परमेश्वरकी ही सर्वात्मभावसे शरण ग्रहण कर लेते हैं, वे सब भूतोंको मोहित करनेवाली इस मायासे तर जाते हैं—वे इसके पार हो जाते हैं अर्थात् संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं ॥ १४ ॥
यदि आपके शरण हुए मनुष्य इस मायासे तर जाते हैं तो फिर सभी आपकी शरण क्यों नहीं लेते? इसपर कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
दैवी देवस्य मम ईश्वरस्य विष्णोः स्वभूता हि यस्माद् एषा यथोक्ता गुणमयी मम माया दुरत्यया दुःखेन अत्ययः अतिक्रमणं यस्या सा दुरत्यया। तत्र एवं सति सर्वधर्मान् परित्यज्य माम् एव मायाविनं स्वात्मभूतं सर्वात्मना ये प्रपद्यन्ते ते मायाम् एतां सर्वभूत-मोहिनीं तरन्ति अतिक्रामन्ति, संसारबन्धनाद् मुच्यन्ते इत्यर्थः ॥ १४ ॥
यदि त्वां प्रपन्ना मायाम् एतां तरन्ति कस्मात् त्वाम् एव सर्वे न प्रपद्यन्ते, इति उच्यते—