प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७ ॥
teṣāṃ jñānī nityayukta ekabhaktirviśiṣyate.
priyo hi jñānino’tyarthamahaṃ sa ca mama priyaḥ .. 17 ..
उन चार प्रकारके भक्तोंमें जो ज्ञानी है अर्थात् यथार्थ तत्त्वको जाननेवाला है वह तत्त्ववेत्ता होनेके कारण सदा मुझमें स्थित है और उसकी दृष्टिमें अन्य किसी भजनेयोग्य वस्तुका अस्तित्व न रहनेके कारण वह केवल एक मुझ परमात्मामें ही अनन्य भक्तिवाला होता है। इसलिये वह अनन्य प्रेमी (ज्ञानी भक्त) श्रेष्ठ माना जाता है। (अन्य तीनोंकी अपेक्षा) अधिक—उच्च कोटिका समझा जाता है।
क्योंकि मैं ज्ञानीका आत्मा हूँ इसलिये उसको अत्यन्त प्रिय हूँ।
संसारमें यह प्रसिद्ध ही है कि आत्मा ही प्रिय होता है। इसलिये ज्ञानीका आत्मा होनेके कारण भगवान् वासुदेव उसे अत्यन्त प्रिय होता है। यह अभिप्राय है।
तथा वह ज्ञानी भी मुझ वासुदेवका आत्मा ही है, अतः वह मेरा अत्यन्त प्रिय है ॥ १७ ॥
तो फिर क्या आर्त आदि तीन प्रकारके भक्त आप वासुदेवके प्रिय नहीं हैं ? यह बात नहीं, तो क्या बात है ?
तात्पर्य पढ़ें
तेषां चतुर्णां मध्ये ज्ञानी तत्त्ववित् तत्त्व-वित्त्वाद् नित्ययुक्तो भवति एकभक्तिः च अन्यस्य भजनीयस्य अदर्शनाद् अतः स एकभक्तिः विशिष्यते, विशेषम् आधिक्यम् आपद्यते अति-रिच्यते इत्यर्थः ।
प्रियो हि यस्माद् अहम् आत्मा ज्ञानिनः अतः तस्य अहम् अत्यर्थं प्रियः ।
प्रसिद्धं हि लोके आत्मा प्रियो भवति इति ।
तस्माद् ज्ञानिनः आत्मत्वाद् वासुदेवः प्रियो भवति इत्यर्थः ।
स च ज्ञानी मम वासुदेवस्य आत्मा एव इति मम अत्यर्थं प्रियः ॥ १७ ॥
न तर्हि आर्तादयः त्रयो वासुदेवस्य प्रियाः । न, किं तर्हि—