आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥ १८ ॥
udārāḥ sarva evaite jñānī tvātmaiva me matam .
āsthitaḥ sa hi yuktātmā māmevānuttamāṃ gatim .. 18 ..
ये सभी भक्त उदार हैं, श्रेष्ठ हैं। अर्थात् वे तीनों भी मेरे प्रिय ही हैं। क्योंकि मुझ वासुदेव को अपना कोई भी भक्त अप्रिय नहीं होता, परंतु ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय होता है इतनी विशेषता है।
ऐसा क्यों है सो कहते हैं—
ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है, वह मुझसे अन्य नहीं है, यह मेरा निश्चय है, क्योंकि वह योगारूढ़ होने के लिये प्रवृत्त हुआ ज्ञानी ‘स्वयं मैं ही भगवान् वासुदेव हूँ, दूसरा नहीं’ ऐसा युक्तात्मा—समाहितचित्त होकर मुझ परम प्राप्तव्य गतिस्वरूप परब्रह्म में ही आने के लिये प्रवृत्त है ॥ १८ ॥
फिर भी ज्ञानी की स्तुति करते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
उदारा उत्कृष्टाः सर्व एव एते त्रयः अपि मम प्रिया एव इत्यर्थः । न हि कश्चिद् मद्भक्तो मम वासुदेवस्य अप्रियो भवति, ज्ञानी तु अत्यर्थं प्रियो भवति इति विशेषः ।
तत् कस्माद् इति आह—
ज्ञानी तु आत्मा एव न अन्यो मत्त इति मे मम मतं निश्चयः । आस्थित आरोढुं प्रवृत्तः स ज्ञानी हि यस्माद् अहम् एव भगवान् वासुदेवो न अन्यः अस्मि इति एवं युक्तात्मा समाहितचित्तः सन् माम् एव परं ब्रह्म गन्तव्यम् अनुत्तमां गतिं गन्तुं प्रवृत्त इत्यर्थः ॥ १८ ॥
ज्ञानी पुनः अपि स्तूयते—