अध्याय 7 - श्लोक 20

कामैस्तैस्तैर्हतज्ञानाः
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥ २० ॥

kāmaistaistairhatajñānāḥ
taṃ taṃ niyamamāsthāya prakṛtyā niyatāḥ svayā .. 20 ..


पुत्र, पशु, स्वर्ग आदि भोगों की प्राप्तिविषयक नाना कामनाओं द्वारा जिनका विवेक-विज्ञान नष्ट हो चुका है वे लोग अपनी प्रकृति से अर्थात् जन्म-जन्मान्तरमें इकट्ठे किये हुए संस्कारों के समुदायरूप स्वभाव से प्रेरित हुए अन्य देवताओं को अर्थात् आत्मस्वरूप मुझ वासुदेव से भिन्न जो देवता हैं, उनको, उन्हीं की आराधना के लिये जो-जो नियम प्रसिद्ध हैं उनका अवलम्बन करके भजते हैं अर्थात् उनकी शरण लेते हैं ॥ २० ॥

उन कामी पुरुषोंमें से—

तात्पर्य पढ़ें

कामैः तैः तैः पुत्रपशुस्वर्गादिविषयैः हृतज्ञाना अपहृतविवेकविज्ञानाः प्रपद्यन्ते अन्यदेवताः प्राप्नुवन्ति वासुदेवाद् आत्मनः अन्या देवताः तं तं नियमं देवताराधने प्रसिद्धो यो यो नियमः तं तम् आस्थाय आश्रित्य प्रकृत्या स्वभावेन जन्मान्तरार्जितसंस्कारविशेषेण नियता नियमिताः स्वया आत्मीयया ॥ २० ॥

तेषां च कामिनाम्—