सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥ २७ ॥
icchādveṣasamutthena dvandvamohena bhārata .
sarvabhūtāni sammohaṃ sarge yānti parantapa .. 27 ..
इच्छा और द्वेष इन दोनोंसे जो उत्पन्न होता है उसका नाम इच्छाद्वेषसमुत्थ है, उससे (प्राणी मोहित होते हैं।)
वह कौन है ? ऐसी विशेष जिज्ञासा होनेपर यह कहते हैं—
द्वन्द्वोंके निमित्तसे होनेवाला जो मोह है उस द्वन्द्व-मोहसे (सब मोहित होते हैं)। शीत और उष्णकी भाँति परस्परविरुद्ध (स्वभाववाले) और सुख-दुःख तथा उनके कारणोंमें रहनेवाले वे इच्छा और द्वेष ही यथासमय सब भूतप्राणियोंसे सम्बन्धयुक्त होकर द्वन्द्व नामसे कहे जाते हैं। सो ये इच्छा और द्वेष, जब इस प्रकार सुख-दुःख और उनके कारणकी प्राप्ति होनेपर प्रकट होते हैं, तब वे सब भूतोंकी बुद्धिको अपने वशमें करके परमार्थ-तत्त्वविषयक ज्ञानकी उत्पत्तिका प्रतिबन्ध करनेवाले मोहको उत्पन्न करते हैं।
जिसका चित्त इच्छा-द्वेषरूप दोषोंके वशमें फँस रहा है, उसको बाहरी विषयोंके भी यथार्थ तत्त्वका ज्ञान प्राप्त नहीं होता, फिर उन दोनोंसे जिसकी बुद्धि आच्छादित हो रही है ऐसे मूढ़ पुरुषको अनेकों प्रतिबन्धोंवाले अन्तरात्माके सम्बन्धमें ज्ञान नहीं होता, इसमें तो कहना ही क्या है?
इसलिये हे भारत! अर्थात् भरतवंशमें उत्पन्न अर्जुन! उस इच्छा-द्वेष-जन्य द्वन्द्व-निमित्तक मोहके द्वारा मोहित हुए समस्त प्राणी, हे परंतप! जन्मकालमें—उत्पन्न होते ही मूढभावमें फँस जाते हैं।
अभिप्राय यह है कि उत्पत्तिशील समस्त प्राणी मोहके वशीभूत हुए ही उत्पन्न होते हैं।
ऐसा होनेके कारण द्वन्द्वमोहसे जिनका ज्ञान प्रतिबद्ध हो गया है वे मोहित हुए समस्त प्राणी अपने आत्मारूप मुझ (परमात्मा)-को नहीं जानते और इसीलिये वे आत्मभावसे मुझे नहीं भजते ॥ २७ ॥
तो फिर इस द्वन्द्वमोहसे छूटे हुए ऐसे कौन-से मनुष्य हैं जो आपको शास्त्रोक्त प्रकारसे आत्मभावसे भजते हैं? इस अपेक्षित अर्थको दिखानेके लिये कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
इच्छाद्वेषसमुत्थेन इच्छा च द्वेषः च इच्छाद्वेषौ ताभ्यां समुत्तिष्ठति इति इच्छाद्वेषसमुत्थः तेन इच्छाद्वेषसमुत्थेन।
केन इति विशेषापेक्षायाम् इदम् आह—
द्वन्द्वमोहेन द्वन्द्वनिमित्तो मोहो द्वन्द्वमोहः तौ एव इच्छाद्वेषौ शीतोष्णवत् परस्परविरुद्धौ सुखदुःखतद्धेतुविषयौ यथाकालं सर्वभूतैः सम्बध्यमानौ द्वन्द्वशब्देन अभिधीयेते । तत्र यदा इच्छाद्वेषौ सुखदुःखतद्धेतुसम्प्राप्त्या लब्धात्मकौ भवतः तदा तौ सर्वभूतानां प्रज्ञायाः स्ववशापादनद्वारेण परमार्थात्मतत्त्वविषय- ज्ञानोत्पत्तिबन्धकारणं मोहं जनयतः ।
न हि इच्छाद्वेषदोषवशीकृतचित्तस्य यथा-भूतार्थविषयज्ञानम् उत्पद्यते बहिः अपि किमु वक्तव्यं ताभ्याम् आविष्टबुद्धेः सम्मूढस्य प्रत्यगात्मनि बहुप्रतिबन्धे ज्ञानं च उत्पद्यते इति।
अतः तेन इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत भरतान्वयज सर्वभूतानि सम्मोहितानि सन्ति सम्मोह सम्मूढतां सर्गे जन्मनि उत्पत्तिकाले इति एतद् यान्ति गच्छन्ति हे परन्तप।
मोहवशानि एव सर्वभूतानि जायमानानि जायन्ते इति अभिप्रायः ।
यत एवम् अतः तेन द्वन्द्वमोहेन प्रतिबद्ध-प्रज्ञानानि सर्वभूतानि सम्मोहितानि माम् आत्मभूतं न जानन्ति अत एव आत्मभावेन मां न भजन्ते ॥ २७ ॥
के पुनः अनेन द्वन्द्वमोहेन निर्मुक्ताः सन्तः त्वां विदित्वा यथाशास्त्रम् आत्मभावेन भजन्ते इति अपेक्षितम् अर्थं दर्शयितुम् उच्यते—