जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५ ॥
apareyamitastvanyāṃ prakṛtiṃ viddhi me parām.
jīvabhūtāṃ mahābāho yayedaṃ dhāryate jagat .. 5 ..
यह (उपर्युक्त) मेरी अपरा प्रकृति है अर्थात् परा नहीं, किंतु निकृष्ट है, अशुद्ध है और अनर्थ करनेवाली है एवं संसारबन्धनरूपा है।
और हे महाबाहो! इस उपर्युक्त प्रकृति में दूसरी जीवरूपा अर्थात् प्राणधारण की निमित्त बनी हुई जो क्षेत्रज्ञरूपा प्रकृति है, अन्तर में प्रवृष्ट हुई जिस प्रकृति द्वारा यह समस्त जगत् धारण किया जाता है उसको तू मेरी परा प्रकृति जान अर्थात् उसे मेरी आत्मरूपा उत्तम और शुद्ध प्रकृति जान ॥ ५ ॥
तात्पर्य पढ़ें
अपरा न परा निकृष्टा अशुद्धा अनर्थकरी संसारबन्धनात्मिका इयम् ।
इतः अस्या यथोक्तायाः तु अन्यां विशुद्धां प्रकृतिं मम आत्मभूतां विद्धि मे परां प्रकृष्टां जीवभूतां क्षेत्रज्ञलक्षणां प्राणधारणनिमित्तभूतां हे महाबाहो यया प्रकृत्या इदं धार्यते जगत् अन्तःप्रविष्टया ॥ ५ ॥