प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ ८ ॥
raso’hamapsu kaunteya prabhāsmi śaśisūryayoḥ .
praṇavaḥ sarvavedeṣu śabdaḥ khe pauruṣaṃ nṛṣu .. 8 ..
जलमें मैं रस हूँ अर्थात् जल का जो सार है उसका नाम रस है उस रसरूप मुझ परमात्मामें समस्त जल पिरोया हुआ है। ऐसे ही और सब में भी समझना चाहिये।
जैसे जलमें मैं रस हूँ, वैसे ही चन्द्रमा और सूर्य में मैं प्रकाश हूँ। समस्त वेदों में मैं ओंकार हूँ अर्थात् उस ओंकाररूप मुझ परमात्मामें सब वेद पिरोये हुए हैं।
आकाश में उसका सारभूत शब्द हूँ, अर्थात् उस शब्दरूप मुझ ईश्वरमें आकाश पिरोया हुआ है।
तथा पुरुषोंमें मैं पौरुष हूँ अर्थात् पुरुषोंमें जो पुरुषत्व है, जिससे उनको पुरुष समझा जाता है वह मैं हूँ, उस पौरुषरूप मुझ ईश्वरमें पुरुष पिरोये हुए हैं ॥ ८ ॥
तात्पर्य पढ़ें
रसः अहम् अपां यः सारः स रसः तस्मिन् रसभूते मयि आपः प्रोता इत्यर्थः। एवं सर्वत्र।
यथा अहम् अप्सु रस एवं प्रभा अस्मि शशिसूर्ययोः । प्रणव ओङ्कारः सर्ववेदेषु तस्मिन् प्रणवभूते मयि सर्वे वेदाः प्रोताः ।
तथा खे आकाशे शब्दः सारभूतः तस्मिन् मयि खं प्रोतम्।
तथा पौरुषं पुरुषस्य भावो यतः पुम्बुद्धिः
नृषु तस्मिन् मयि पुरुषाः प्रोताः ॥ ८ ॥