यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥
omityekākṣaraṃ brahma vyāharanmāmanusmaran .
yaḥ prayāti tyajandehaṃ sa yāti paramāṃ gatim .. 13 ..
‘ओम्’ इस एक अक्षररूप ब्रह्म का अर्थात् ब्रह्म के स्वरूप का लक्ष्य करानेवाले ओंकार का उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थरूप मुझ ईश्वर का चिन्तन करता हुआ जो पुरुष शरीर को छोड़कर जाता है अर्थात् मरता है,
वह इस प्रकार शरीर को छोड़कर जानेवाला परम गति को पाता है। यहाँ ‘त्यजन्देहम्’ यह विशेषण ‘मरण’ का लक्ष्य कराने के लिये है। अभिप्राय यह कि देह के त्याग से ही आत्मा का मरण है, स्वरूप के नाश से नहीं ॥ १३ ॥
तथा—
तात्पर्य पढ़ें
ओम् इति एकाक्षरं ब्रह्म ब्रह्मणः अभि-धानभूतम् ओङ्कारं व्याहरन् उच्चारयन् तदर्थभूतं माम् ईश्वरम् अनुस्मरन् अनुचिन्तयन् यः प्रयाति म्रियते,
स त्यजन् परित्यजन् देहं शरीरं त्यजन् देहम् इति प्रयाणविशेषणार्थं देहत्यागेन प्रयाणम् आत्मनो न स्वरूपनाशेन इत्यर्थः । स एवं त्यजन् याति गच्छति परमां प्रकृष्टां गतिम् ॥ १३ ॥