नाप्रुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ १५ ॥
māmupetya punarjanma duḥkhālayamaśāśvatam .
nāpruvanti mahātmānaḥ saṃsiddhiṃ paramāṃ gatāḥ .. 15 ..
मुझ ईश्वर को पाकर अर्थात् मेरे भाव को प्राप्त करके फिर (वे महापुरुष) पुनर्जन्म को नहीं पाते।
किस प्रकार के पुनर्जन्म को नहीं पाते, यह स्पष्ट करने के लिये उसके विशेषण बतलाते हैं—
आध्यात्मिक आदि तीनों प्रकार के दुःखों का जो स्थान—आधार है अर्थात् समस्त दुःख जिसमें रहते हैं, केवल दुःखों का स्थान ही नहीं जो अशाश्वत भी है अर्थात् जिसका स्वरूप स्थिर नहीं है, ऐसे पुनर्जन्म को मोक्षरूप परम श्रेष्ठ सिद्धि को प्राप्त हुए महात्मा—संन्यासीगण नहीं पाते। परंतु जो मुझे प्राप्त नहीं होते वे फिर संसार में आते हैं ॥ १५ ॥
तो क्या आपके सिवा अन्य स्थान को प्राप्त होनेवाले पुरुष फिर संसार में आते हैं ? इसपर कहा जाता है—
तात्पर्य पढ़ें
माम् उपेत्य माम् ईश्वरम् उपेत्य मद्भावम् आपाद्य पुनर्जन्म पुनरुत्पत्तिं न प्राप्नुवन्ति।
किंविशिष्टं पुनर्जन्म न प्राप्नुवन्ति इति तद्विशेषणम् आह—
दुःखालयं दुःखानाम् आध्यात्मिकादीनाम् आलयम् आश्रयम् आलीयन्ते यस्मिन् दुःखानि इति दुःखालयं जन्म। न केवल दुःखालयम् अशाश्वतम् अनवस्थितस्वरूपं च न आप्नुवन्ति ईदृशं पुनर्जन्म महात्मानो यतयः संसिद्धिं मोक्षाख्यां परमां प्रकृष्टां गताः प्राप्ताः। ये पुनः मां न प्राप्नुवन्ति ते पुनः आवर्तन्ते ॥ १५ ॥
किं पुनः त्वत्तः अन्यत् प्राप्ताः पुनः आवर्तन्ते इति उच्यते—