प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके ॥ १८ ॥
avyaktādvyaktayaḥ sarvāḥ
prabhavantyaharāgame .
rātryāgame pralīyante tatraivāvyaktasañjñake .. 18 ..
दिनके आरम्भकाल का नाम ‘अहरागम’ है, ब्रह्माके दिनके आरम्भकाल में अर्थात् ब्रह्माके प्रबोधकाल में अव्यक्त से—प्रजापति की निद्रावस्था से समस्त व्यक्तियाँ—स्थावर-जङ्गमरूप समस्त प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं—प्रकट होती हैं। जो व्यक्त—प्रकट होती है, उसका नाम व्यक्ति है।
तथा रात्रि के आनेपर—ब्रह्माके शयन करनेके समय उस पूर्वोक्त अव्यक्त नामक प्रजापतिकी निद्रावस्था में ही समस्त प्राणी लीन हो जाते हैं ॥ १८ ॥
न किये कर्मोंका फल मिलना और किये हुए कर्मोंका फल न मिलना, इस दोष का परिहार करनेके लिये, बन्धन और मुक्तिका मार्ग बतलानेवाले शास्त्रवाक्योंकी सफलता दिखानेके लिये और ‘अविद्यादि पञ्च-क्लेशमूलक कर्मसंस्कारोंके वश में पड़कर पराधीन हुआ प्राणी-समुदाय बारंबार उत्पन्न हो-होकर लय हो जाता है’—इस प्रकारके कथन से संसार में वैराग्य दिखलाने के लिये यह कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
अव्यक्ताद् अव्यक्तं प्रजापतेः स्वापावस्था तस्माद् अव्यक्ताद् व्यक्तयो व्यज्यन्ते इति व्यक्तयः स्थावरजङ्गमलक्षणाः सर्वाः प्रजाः प्रभवन्ति अभिव्यज्यन्ते, अह्न आगमः अहरागमः तस्मिन् अहरागमे काले ब्रह्मणः प्रबोधकाले ।
तथा रात्र्यागमे ब्रह्मणः स्वापकाले प्रलीयन्ते सर्वा व्यक्तयः तत्र एव पूर्वोक्ते अव्यक्त-सञ्ज्ञके ॥ १८ ॥
अकृताभ्यागमकृतविप्रणाशदोषपरिहारार्थम्, बन्धमोक्षशास्त्रप्रवृत्तिसाफल्यप्रदर्शनार्थम् अविद्यादि-क्लेशमूलकर्माशयवशात् च अवशो भूतग्रामो भूत्वा भूत्वा प्रलीयते इति अतः संसारे वैराग्यप्रदर्शनार्थं च इदम् आह—