यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥ २२ ॥
puruṣaḥ sa paraḥ pārtha bhaktyā labhyastvananyayā .
yasyāntaḥsthāni bhūtāni yena sarvamidaṃ tatam .. 22 ..
शरीररूप पुरमें शयन करनेसे या सर्वत्र परिपूर्ण होनेसे परमात्माका नाम पुरुष है। हे पार्थ! वह निरतिशय परमपुरुष, जिससे पर (सूक्ष्म-श्रेष्ठ) अन्य कुछ भी नहीं है, जिस पुरुषके अन्तर्गत समस्त कार्यरूप भूत स्थित हैं—क्योंकि कार्य कारणके अन्तर्वर्ती हुआ करता है—और जिस पुरुषसे यह सारा संसार आकाशसे घट आदिकी भाँति व्याप्त है। ऐसा परमात्मा, अनन्य भक्तिसे अर्थात् आत्मविषयक ज्ञानरूप भक्तिसे प्राप्त होने योग्य है ॥ २२ ॥
जिन्होंने ओंकारमें ब्रह्मबुद्धि सम्पादन की है, जिन्हें कालान्तरमें मुक्ति मिलनेवाली है तथा यहाँ जिनका प्रकरण चल रहा है, उन योगियोंकी ब्रह्मप्राप्तिके लिये आगेका मार्ग बताना चाहिये। अत: विवक्षित अर्थको बतलानेके लिये ही ‘यत्र काले’ इत्यादि अगले श्लोक कहे जाते हैं। यहाँ पुनरावर्ती मार्गका वर्णन दूसरे मार्गकी स्तुति करनेके लिये किया गया है—
तात्पर्य पढ़ें
पुरुषः पुरि शयनात् पूर्णत्वाद् वा स परः पार्थ परो निरतिशयो यस्मात् पुरुषाद् न परं किञ्चित् स भक्त्या लभ्यः तु ज्ञानलक्षणया अनन्यया आत्मविषयया—यस्य पुरुषस्य अन्तःस्थानि मध्यस्थानि कार्यभूतानि भूतानि । कार्यं हि कारणस्य अन्तर्वर्ति भवति । येन पुरुषेण सर्वम् इदं जगत् ततं व्याप्तम् आकाशेन इव घटादि ॥ २२ ॥
प्रकृतानां योगिनां प्रणवावेशितब्रह्मबुद्धीनां कालान्तरमुक्तिभाजां ब्रह्मप्रतिपत्तये उत्तरो मार्गो वक्तव्य इति यत्र काले इत्यादि विवक्षितार्थसमर्पणार्थम् उच्यते। आवृत्ति-मार्गोपन्यास इतरमार्गस्तुत्यर्थः—