प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३ ॥
yatra kāle tvanāvṛttimāvṛttiṃ caiva yoginaḥ
prayātā yānti taṃ kālaṃ vakṣyāmi bharatarṣabha .. 23 ..
‘यत्र काले’ इस पद का व्यवधानयुक्त ‘प्रयाताः’ इस अगले पद से सम्बन्ध है।
जिस काल में अनावृत्तिको—अपुनर्जन्मको और जिस काल में आवृत्तिको—उससे विपरीत पुनर्जन्मको योगी लोग पाते हैं। ‘योगिनः’ इस पद से कर्म करनेवाले कर्मी लोग भी योगी कहे गये हैं; क्योंकि ‘कर्मयोगेन योगिनाम्’ इस विशेषण से कर्मी भी किसी गुणविशेष से योगी हैं।
तात्पर्य यह है कि हे अर्जुन! जिस काल में मरे हुए योगी लोग पुनर्जन्मको नहीं पाते और जिस काल में मरे हुए लोग पुनर्जन्म पाते हैं मैं अब उस काल का वर्णन करता हूँ ॥ २३ ॥
तात्पर्य पढ़ें
यत्र काले प्रयाता इति व्यवहितेन सम्बन्धः ।
यत्र यस्मिन् काले तु अनावृत्तिम् अपुनर्जन्म आवृत्तिं तद्विपरीतां च एव । योगिन इति योगिनः कर्मिणः च उच्यन्ते । कर्मिणः तु गुणतः ‘कर्मयोगेन योगिनाम्’ इति विशेषणात् योगिनः ।
यत्र काले प्रयाता मृता योगिनः अनावृत्तिं यान्ति यत्र काले च प्रयाता आवृत्तिं यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३ ॥