एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥ २६ ॥
śuklakṛṣṇe gatī hyete jagataḥ śāśvate mate.
ekayā yātyanāvṛttimanyayāvartate punaḥ .. 26 ..
शुक्ल और कृष्ण—ये दो मार्ग, अर्थात् जिसमें ज्ञानका प्रकाश है वह शुक्ल और जिसमें उसका अभाव है वह कृष्ण—ऐसे ये दोनों मार्ग जगत् के लिये नित्य—सदासे माने गये हैं; क्योंकि जगत् नित्य है। यहाँ
जगत्–शब्दसे जो ज्ञानी और कर्मी उपर्युक्त गतिके अधिकारी हैं उन्हींको समझना चाहिये, क्योंकि सारे संसार के लिये यह गति सम्भव नहीं है।
उन दोनों मार्गोंमेंसे एक—शुक्लमार्गसे गया हुआ तो फिर लौटता नहीं है और दूसरे मार्गसे गया हुआ लौट आता है ॥ २६ ॥
तात्पर्य पढ़ें
शुक्लकृष्णे शुक्ला च कृष्णा च शुक्लकृष्णे । ज्ञानप्रकाशकत्वात् शुक्ला तदभावात् कृष्णा । एते शुक्लकृष्णे हि गती जगत इति
अधिकृतानां ज्ञानकर्मणोः न जगतः सर्वस्य एव एते गती सम्भवतः शाश्वते नित्ये संसारस्य नित्यत्वाद् मते अभिप्रेते।
तत्र एकया शुक्लया याति अनावृत्तिम्
अन्यया इतरया आवर्तते पुनः भूयः ॥ २६ ॥