अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्धवकरो विसर्गः कर्मसञ्ज्ञितः ॥ ३ ॥
śrībhagavānuvāca—
akṣaraṃ brahma paramaṃ svabhāvo’dhyātmamucyate .
bhūtabhāvoddhavakaro visargaḥ karmasañjñitaḥ .. 3 ..
परम अक्षर ब्रह्म है अर्थात् ‘हे गार्गि! इस अक्षर के शासन में ही यह सूर्य और चन्द्रमा धारण किये हुए स्थित हैं’ इत्यादि श्रुतियोंसे जिसका वर्णन किया गया है, जो कभी नष्ट नहीं होता वह परमात्मा ही ‘ब्रह्म’ है।
‘परम’ विशेषणसे युक्त होनेके कारण यहाँ अक्षर शब्दसे ‘ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म’ इस वाक्यमें वर्णित ओंकारका ग्रहण नहीं किया गया है; क्योंकि ‘परम’ वह विशेषण निरतिशय अक्षर ब्रह्ममें ही अधिक सम्भव—युक्तियुक्त है।
उसी परब्रह्मका जो प्रत्येक शरीरमें अन्तरात्मभाव है उसका नाम स्वभाव है, वह स्वभाव ही ‘अध्यात्म’ कहलाता है।
अभिप्राय यह कि आत्मा यानी शरीर को आश्रय बनाकर जो अन्तरात्मभावसे उसमें रहनेवाला है और परिणाममें जो परमार्थ ब्रह्म ही है वही तत्त्व स्वभाव है, उसे ही अध्यात्म कहते हैं अर्थात् वही अध्यात्म नामसे कहा जाता है।
‘भूतभाव-उद्भव-कर’ अर्थात् भूतोंकी सत्ता ‘भूतभाव’ है। उसका उद्भव (उत्पत्ति) ‘भूतभावोद्भव’ है, उसको करनेवाला ‘भूतभावोद्भवकर’ यानी भूतवस्तु को उत्पन्न करनेवाला, ऐसा जो विसर्ग अर्थात् देवोंके उद्देश्यसे चरु, पुरोडाश आदि (हवन करने योग्य) द्रव्योंका त्याग करना है, वह त्यागरूप यज्ञ, कर्म नामसे कहा जाता है, इस बीजरूप यज्ञसे ही वृष्टि आदिके क्रमसे स्थावर-जङ्गम समस्त भूतप्राणी उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥
तात्पर्य पढ़ें
अक्षरं न क्षरति इति परमात्मा ‘तस्य वा'
अक्षरस्य प्रशासने गार्गि’ (बृह० उ० ३।८।९)
इति श्रुतेः।
ओङ्कारस्य च ‘ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म’ इति
परेण विशेषणाद् अग्रहणं परमम् इति च निरतिशये
ब्रह्मणि अक्षरे उपपन्नतरं विशेषणम् ।
तस्य एव परस्य ब्रह्मणः प्रतिदेहं प्रत्यगात्मभावः स्वभावः । स्वभावः अध्यात्मम् उच्यते ।
आत्मानं देहम् अधिकृत्य प्रत्यगात्मतया
प्रवृत्तं परमार्थब्रह्मावसानं वस्तु स्वभावः
अध्यात्मम् उच्यते अध्यात्मशब्देन अभिधीयते ।
भूतभावोद्भवकरो भूतानां भावो भूतभावः तस्य उद्भवो भूतभावोद्भवः तं करोति इति भूतभावोद्भवकरो भूतवस्तूत्पत्तिकरः इत्यर्थः विसर्गो विसर्जनं देवतोद्देशेन चरुपुरोडाशादेः द्रव्यस्य परित्यागः स एष विसर्गलक्षणो यज्ञः, कर्मसञ्ज्ञितः कर्मशब्दित इति एतत् । एतस्माद् हि बीजभूताद् वृष्ट्यादिक्रमेण स्थावरजङ्गमानि भूतानि उद्भवन्ति ॥ ३ ॥