अध्याय 8 - श्लोक 4

अधिभूतं क्षरो भावः अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे
पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
देहभृतां      वर ॥ ४ ॥

adhibhūtaṃ kṣaro bhāvaḥ adhiyajño’hamevātra dehe
puruṣaścādhidaivatam .
dehabhṛtāṃ      vara .. 4 ..


जो प्राणिमात्र को आश्रित किये होता है उसका नाम अधिभूत है। वह कौन है? क्षर—जो कि क्षय होता है ऐसा विनाशी भाव यानी जो कुछ भी उत्पत्तिशील पदार्थ हैं वे सब-के-सब अधिभूत हैं।

पुरुष अर्थात् जिससे यह सब जगत् परिपूर्ण है अथवा जो शरीररूप पुरमें रहनेवाला होनेसे पुरुष कहलाता है, वह सब प्राणियों के इन्द्रियादि करणोंका अनुग्राहक सूर्यलोकमें रहनेवाला हिरण्यगर्भ अधिदैवत है।

‘यज्ञ ही विष्णु है’ इस श्रुतिके अनुसार सब यज्ञों का अधिष्ठाता जो विष्णुनामक देवता है वह अधियज्ञ है। हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! इस देहमें जो यज्ञ है उसका अधिष्ठाता वह विष्णुरूप ‘अधियज्ञ’ मैं ही हूँ। यज्ञ शरीरसे ही सिद्ध होता है, अत: यज्ञ का शरीरसे नित्य सम्बन्ध है, इसलिये वह शरीरमें रहनेवाला माना जाता है ॥ ४ ॥

तात्पर्य पढ़ें

अधिभूतं प्राणिजातम् अधिकृत्य भवति इति। कः असौ क्षरः क्षरति इति क्षरो विनाशी भावो यत्किञ्चिद् जनिमद् वस्तु इत्यर्थः।

पुरुषः पूर्णम् अनेन सर्वम् इति पुरि शयनाद्

वा पुरुष आदित्यान्तर्गतो हिरण्यगर्भः सर्व-

प्राणिकरणानाम् अनुग्राहकः सः अधिदैवतम् ।

अधियज्ञः सर्वयज्ञाभिमानिनी देवता विष्ण्वाख्या ‘यज्ञो वै विष्णुः’ इति श्रुतेः। स हि विष्णुः अहम् एव अत्र अस्मिन् देहे यो यज्ञः तस्य अहम् अधियज्ञः, यज्ञो हि देहनिर्वर्त्यत्वेन देहसमवायी इति देहाधिकरणो भवति, देहभृतां वर ॥ ४ ॥