तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ६ ॥
yaṃ yaṃ vāpi smaranbhāvaṃ tyajatyante kalevaram .
taṃ tamevaiti kaunteya sadā tadbhāvabhāvitaḥ .. 6 ..
हे कुन्तीपुत्र! प्राणवियोगके समय (यह जीव) जिस-जिस भी भावका अर्थात् (जिस किसी भी) देवताविशेषका चिन्तन करता हुआ शरीर छोड़ता है, उस भावसे भावित हुआ वह पुरुष सदा उस स्मरण किये हुए भावको ही प्राप्त होता है, अन्यको नहीं। उपास्य देवविषयक भावनाका नाम ‘तद्भाव’ है, वह जिसने भावित यानी बारंबार चिन्तन करनेके द्वारा अभ्यस्त किया हो, उसका नाम ‘तद्भावभावित’ है, ऐसा होता हुआ (उसीको प्राप्त होता है) ॥ ६ ॥
क्योंकि इस प्रकार अन्तकालकी भावना ही अन्य शरीरकी प्राप्तिका कारण है—
तात्पर्य पढ़ें
यं यं वा अपि यं यं भावं देवताविशेषं स्मरन् चिन्तयन् त्यजति परित्यजति अन्ते प्राणवियोगकाले कलेवरम्, तं तम् एव स्मृतं भावम् एव एति न अन्यं कौन्तेय सदा सर्वदा तद्भावभावितः तस्मिन् भावः तद्भावः स भावितः स्मर्यमाणतया अभ्यस्तो येन स तद्भावभावितः सन् ॥ ६ ॥
यस्माद् एवम् अन्त्या भावना देहान्तरप्राप्तौ कारणम्—