अध्याय 9 - श्लोक 10

मयाध्यक्षेण हेतूनानेन
प्रकृतिः कौन्तेय
सू्यते सचराचरम् । जगद्विपरिवर्तते ॥ १० ॥

mayādhyakṣeṇa hetūnānena
prakṛtiḥ kaunteya
sūyate sacarācaram . jagadviparivartate .. 10 ..


सब ओर से द्रष्टामात्र ही जिसका स्वरूप है ऐसे निर्विकारस्वरूप मुझ अधिष्ठातासे (प्रेरित होकर) अविद्यारूप मेरी त्रिगुणमयी माया—प्रकृति समस्त चराचर जगत्को उत्पन्न किया करती है।

वेद-मन्त्र भी यही बात कहते हैं कि ‘समस्त भूतोंमें अदृश्यभावसे रहनेवाला एक ही देव है जो कि सर्वव्यापी और सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा तथा कर्मोंका स्वामी, समस्त भूतोंका आधार, साक्षी, चेतन, शुद्ध और निर्गुण है।’

हे कुन्तीपुत्र! इसी कारण से अर्थात् मैं इसका अध्यक्ष हूँ इसीलिये चराचरसहित साकार-निराकाररूप समस्त जगत् सब अवस्थाओंमें परिवर्तित होता रहता है,

क्योंकि जगत्की समस्त प्रवृत्तियाँ साक्षी-चेतनके ज्ञानका विषय बननेके लिये ही हैं। मैं यह खाऊँगा, यह देखता हूँ, यह सुनता हूँ, अमुक सुखका अनुभव करता हूँ, दुःख अनुभव करता हूँ, उसके लिये अमुक कार्य करूँगा, इसके लिये अमुक कार्य करूँगा, अमुक वस्तु को जानूँगा इत्यादि जगत्की समस्त प्रवृत्तियाँ ज्ञानाधीन और ज्ञानमें ही लय हो जानेवाली हैं।

‘जो इस जगत्का अध्यक्ष साक्षी चेतन है वह परम हृदयाकाशमें स्थित है’ इत्यादि मन्त्र भी यही अर्थ दिखला रहे हैं।

जब कि सबका अध्यक्ष रूप चैतन्यमात्र एक देव वास्तवमें समस्त भोगोंके सम्बन्धसे रहित है और उसके सिवा अन्य चेतन न होनेके कारण दूसरे भोक्ताका अभाव है तो यह सृष्टि किसके लिये है ? इस प्रकार का प्रश्न और उसका उत्तर—यह दोनों ही नहीं बन सकते (अर्थात् यह विषय अनिर्वचनीय है)।

‘( इसको ) साक्षात् कौन जानता है—इस विषय में कौन कह सकता है? यह जगत् कहाँसे आया? किस कारण यह रचना हुई?’ इत्यादि मन्त्रोंसे ( यही बात कही गयी है ) ।

इसके सिवा भगवान्‌ ने भी कहा है कि ‘अज्ञानसे ज्ञान आवृत हो रहा है इसलिये समस्त जीव मोहित हो रहे हैं’ ॥ १० ॥

इस प्रकार मैं यद्यपि नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव तथा सभी प्राणियोंका आत्मा हूँ तो भी—

तात्पर्य पढ़ें

मया सर्वतो दृशिमात्रस्वरूपेण अविक्रिया-त्मना अध्यक्षेण मम माया त्रिगुणात्मिका अविद्यालक्षणा प्रकृतिः सूयते उत्पादयति सचराचरं जगत्।

तथा च मन्त्रवर्णः—‘एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥’ (श्वे० उ० ६ । ११) इति ।

हेतुना निमित्तेन अनेन अध्यक्षत्वेन कौन्तेयः जगत् सचराचरं व्यक्ताव्यक्तात्मकं विपरिवर्तते सर्वासु अवस्थासु।

दृशिकर्मत्वापत्तिनिमित्ता हि जगतः सर्वा प्रवृत्तिः अहम् इदं भोक्ष्ये पश्यामि इदं शृणोमि इदं सुखम् अनुभवामि दुःखम् अनुभवामि तदर्थम् इदं करिष्यामि एतदर्थम् इदं करिष्ये इदं ज्ञास्यामि इत्याद्या अवगतिनिष्ठा अवगत्यवसाना एव ।

‘यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्’ (तै० ब्रा० २। ८। ९) इत्यादयः च मन्त्रा एतम् अर्थं दर्शयन्ति।

ततः च एकस्य देवस्य सर्वाध्यक्षभूत-चैतन्यमात्रस्य परमार्थतः सर्वभोगानभिसम्बन्धिनः अन्यस्य चेतनान्तरस्य अभावे भोक्तुः अन्यस्य अभावात् किन्निमित्ता इयं सृष्टिः इति अत्र प्रश्नप्रतिवचने अनुपपन्ने ।

‘को अद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः’ (तै० ब्रा० २। ८। ९) इत्यादिमन्त्रवर्णेभ्यः।

दर्शितं च भगवता ‘अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः’ इति ॥ १० ॥

एवं मां नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावं सर्वजन्तूनाम् आत्मानम् अपि सन्तम्—