मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ १२ ॥
katham—
moghāśā moghakarmāṇo moghajñānā vicetasaḥ .
rākṣasīmāsurīṃ caiva prakṛtiṃ mohinīṃ śritāḥ .. 12 ..
वे मोघाशा—जिनकी आशाएँ—कामनाएँ व्यर्थ हों ऐसे व्यर्थ कामना करनेवाले और मोघकर्मा—व्यर्थ कर्म करनेवाले होते हैं; क्योंकि उनके द्वारा जो कुछ अग्निहोत्रादि कर्म किये जाते हैं वे सब अपने अन्तरात्मारूप भगवान् का अनादर करने के कारण निष्फल हो जाते हैं। इसलिये वे मोघकर्मा होते हैं।
इसके अतिरिक्त वे मोघज्ञानी—निष्फल ज्ञानवाले होते हैं, अर्थात् उनका ज्ञान भी निष्फल ही होता है। और वे विचेता अर्थात् विवेकहीन भी होते हैं।
तथा वे मोह उत्पन्न करनेवाली देहात्मवादिनी राक्षसी और आसुरी प्रकृतिका यानी राक्षसों के और असुरों के स्वभावका आश्रय करनेवाले हो जाते हैं। अभिप्राय यह कि तोड़ो, फोड़ो, पिओ, खाओ, दूसरों का धन लूट लो इत्यादि वचन बोलनेवाले और बड़े क्रूरकर्मा हो जाते हैं। श्रुति भी कहती है कि ‘वे असुरों के रहने योग्य लोक प्रकाशहीन हैं’ इत्यादि ॥ १२ ॥
परंतु जो श्रद्धायुक्त हैं और भगवद्भक्तिरूप मोक्षमार्ग में लगे हुए हैं वे—
तात्पर्य पढ़ें
मोघाशा वृथा आशा आशिषो येषां ते मोघाशाः । तथा मोघकर्माणो यानि च अग्निहोत्रादीनि तैः अनुष्ठीयमानानि कर्माणि तानि च तेषां भगवत्परिभवात् स्वात्मभूतस्य अवज्ञानाद् मोघानि एव निष्फलानि कर्माणि भवन्ति इति मोघकर्माणः ।
तथा मोघज्ञाना निष्फलज्ञाना ज्ञानम् अपि तेषां निष्फलम् एव स्यात्। विचेतसो विगत-विवेकाः च ते भवन्ति इति अभिप्रायः।
किं च ते भवन्ति राक्षसीं रक्षसां प्रकृतिं स्वभावम् आसुरीम् असुराणां च प्रकृतिं मोहिनीं मोहकरीं देहात्मवादिनीं श्रिता आश्रिताः छिन्धि भिन्धि पिब खाद परस्वम् अपहर इति एवं वदनशीलाः क्रूरकर्माणो भवन्ति इत्यर्थः। ‘असुर्या नाम ते लोकाः’ (ई० उ० ३) इति श्रुतेः ॥ १२ ॥
ये पुनः श्रद्धाना भगवद्भक्तिलक्षणे मोक्ष-मार्ग में प्रवृत्ताः—