महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ १३ ॥
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ १३ ॥
mahātmānastu māṃ pārtha daivīṃ prakṛtimāśritāḥ .
bhajantyananyamanaso jñātvā bhūtādimavyayam .. 13 ..
हे पार्थ ! शम, दम, दया, श्रद्धा आदि सद्गुणरूप देवों के स्वभाव का अवलम्बन करनेवाले उदारचित्त महात्मा भक्तजन, मुझ ईश्वर को सब भूतों का अर्थात् आकाशादि पञ्चभूतों का और समस्त प्राणियों का भी आदिकारण जानकर एवं अविनाशी समझकर, अनन्य मन से युक्त हुए भजते हैं अर्थात् मेरा चिन्तन किया करते हैं ॥ १३ ॥
किस प्रकार भजते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
महात्मानः तु अक्षुद्रचित्ता माम् ईश्वरं पार्थ दैवीं देवानां प्रकृतिं शमदमदयाश्रद्धादिलक्षणाम् आश्रिताः सन्तः, भजन्ति सेवन्ते अनन्यमनसः अनन्यचित्ता ज्ञात्वा भूतादिं भूतानां वियदादीनां प्राणिनां च आदिं कारणम् अव्ययम् ॥ १३ ॥