अध्याय 9 - श्लोक 15

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥

jñānayajñena cāpyanye yajanto māmupāsate .
ekatvena pṛthaktvena bahudhā viśvatomukham .. 15 ..


यदि भक्तलोग बहुत प्रकार से उपासना करते हैं तो आपकी ही उपासना कैसे करते हैं? इसपर कहते हैं—

कुछ (ज्ञानीजन) दूसरी उपासनाओं को छोड़कर भगवद्विषयक ज्ञानरूप यज्ञ से मेरा पूजन करते हुए उपासना किया करते हैं अर्थात् परमब्रह्म परमात्मा एक ही है, ऐसे एकत्वरूप परमार्थज्ञान से पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं।

और कोई-कोई पृथक् भाव से अर्थात् आदित्य, चन्द्रमा आदि के भेद से इस प्रकार समझकर उपासना करते हैं कि वही भगवान् विष्णु, सूर्य आदि के रूप में स्थित हुए हैं।

तथा कितने ही भक्त ऐसा समझकर कि वही सब ओर मुखवाले विश्वमूर्ति भगवान् अनेक रूप से स्थित हो रहे हैं। उन विश्वरूप विराट् भगवान् ही की विविध प्रकार से उपासना करते हैं ॥ १५ ॥

तात्पर्य पढ़ें

ज्ञानयज्ञेन ज्ञानम् एव भगवद्विषयं यज्ञः तेन ज्ञानयज्ञेन यजन्तः पूजयन्तो माम् ईश्वरं च अपि अन्ये अन्याम् उपासनां परित्यज्य उपासते । तत् च ज्ञानम् एकत्वेन एकम् एव परं ब्रह्म इति परमार्थदर्शनेन यजन्त उपासते ।

केचित् च पृथक्त्वेन आदित्यचन्द्रादिभेदेन स एव भगवान् विष्णुः आदित्यादिरूपेण अवस्थित इति उपासते।

केचिद् बहुधा अवस्थितः स एव भगवान् सर्वतोमुखो विश्वतोमुखो विश्वरूप इति, तं विश्वरूपं सर्वतोमुखं बहुधा बहुप्रकारेण उपासते ॥ १५ ॥