गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ १८ ॥
kiṃ ca—
gatirbhartā prabhuḥ sākṣī nivāsaḥ śaraṇaṃ suhṛt .
prabhavaḥ pralayaḥ sthānaṃ nidhānaṃ bījamavyayam .. 18 ..
गति—कर्मफल, भर्ता—सबका पोषण करनेवाला, प्रभु—सबका स्वामी, प्राणियोंके कर्म और अकर्मका साक्षी, जिसमें प्राणी निवास करते हैं वह वासस्थान, शरण अर्थात् शरणमें आये हुए दुःखियोंका दुःख दूर करनेवाला, सुहृत्—प्रत्युपकार न चाहकर उपकार करनेवाला, प्रभव—जगत् की उत्पत्तिका कारण और जिसमें सब लीन हो जाते हैं वह प्रलय भी मैं ही हूँ।
तथा जिसमें सब स्थित होते हैं वह स्थान, प्राणियोंके कालान्तरमें उपभोग करनेयोग्य कर्मोंका भण्डाररूप निधान और अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ अर्थात् उत्पत्तिशील वस्तुओं की उत्पत्तिका अविनाशी कारण मैं ही हूँ।
जबतक संसार है तबतक उसका बीज भी अवश्य रहता है, इसलिये बीज को अविनाशी कहा है; क्योंकि बिना बीज के कुछ भी उत्पन्न नहीं होता और उत्पत्ति नित्य देखी जाती है, इससे यह जाना जाता है कि बीज की परम्पराका नाश नहीं होता ॥ १८ ॥
तथा—
तात्पर्य पढ़ें
गतिः कर्मफलम्, भर्ता पोष्टा, प्रभुः स्वामी, साक्षी प्राणिनां कृताकृतस्य, निवासो यस्मिन् प्राणिनो निवसन्ति, शरणम् आर्तानां प्रपन्नानां आर्तिहरः, सुहृत् प्रत्युपकारानपेक्षः सन् उपकारी, प्रभव उत्पत्तिः जगतः, प्रलयः प्रलीयते यस्मिन् इति।
तथा स्थानं तिष्ठति अस्मिन् इति, निधानं निक्षेपः कालान्तरोपभोग्यं प्राणिनाम्, बीजं प्ररोहकारणं प्ररोहधर्मिणाम्, अव्ययम् ।
यावत्संसारभावित्वाद् अव्ययम्। न हि अबीजं किञ्चित् प्ररोहति। नित्यं च प्ररोहदर्शनाद् बीजसन्ततिः न व्येति इति गम्यते ॥ १८ ॥