तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ १९ ॥
kiṃ ca—
tapāmyahamahaṃ varṣaṃ nigṛhṇāmyutsṛjāmi ca .
amṛtaṃ caiva mṛtyuśca sadasaccāhamarjuna .. 19 ..
मैं ही सूर्य होकर अपनी कुछ प्रखर रश्मियों से सबको तपाता हूँ और कुछ किरणों से वर्षा करता हूँ तथा वर्षा कर चुकने पर फिर कुछ रश्मियों द्वारा आठ महीने तक जल का शोषण करता रहता हूँ और वर्षाकाल आने पर फिर बरसा देता हूँ।
हे अर्जुन! देवों का अमृत और मर्त्यलोक में बसनेवालों की मृत्यु तथा सत् और असत् सब मैं ही हूँ अर्थात् जो जिसके सम्बन्ध से विद्यमान है वह और जो उसके विपरीत है वह भी मैं ही हूँ।
परंतु (यह ध्यान में रखना चाहिये कि) स्वयं भगवान् अत्यन्त असत् नहीं हैं। अथवा सत् और असत् का अर्थ यहाँ कार्य और कारण समझना चाहिये।
जो ज्ञानी पहले कहे हुए क्रमानुसार एकत्व-पृथक्त्व आदि विज्ञानरूप यज्ञों से पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं वे अपने विज्ञानानुसार मुझे ही प्राप्त होते हैं ॥ १९ ॥
परंतु जो विषयवासनायुक्त अज्ञानी—
तात्पर्य पढ़ें
तपामि अहम् आदित्यो भूत्वा कैश्चिद् रश्मिभिः उल्बणैः अहं वर्षं कैश्चिद् रश्मिभिः उत्सृजामि उत्सृज्य पुनः निगृह्णामि कैश्चिद् रश्मिभिः अष्टभिः मासैः पुनः उत्सृजामि प्रावृषि ।
अमृतं च एव देवानां मृत्युः च मर्त्यानाम्। सद् यस्य यत् सम्बन्धितया विद्यमानं तद्विपरीतम् असत् च एव अहम् अर्जुन।
न पुनः अत्यन्तम् एव असद् भगवान्
स्वयम्। कार्यकारणे वा सदसती।
ये पूर्वोक्तैः अनुवृत्तिप्रकारैः एकत्व-पृथक्त्वादिविज्ञानैः यज्ञैः मां पूजयन्त उपासते ज्ञानविदः ते यथाविज्ञानं माम् एव प्राप्नुवन्ति ॥ १९ ॥
ये पुनः अज्ञाः कामकामाः—