अध्याय 9 - श्लोक 2

तत् च—
राजविद्या
राजगुह्यं
पवित्रमिदमुत्तमम् ।
प्रत्यक्षावगमं
धर्म
सुसुखं
कर्तुमव्ययम् ॥ २ ॥

tat ca—
rājavidyā
rājaguhyaṃ
pavitramidamuttamam .
pratyakṣāvagamaṃ
dharma
susukhaṃ
kartumavyayam .. 2 ..


अतिशय प्रकाशयुक्त होनेके कारण समस्त विद्याओं का राजा है। ब्रह्मविद्या सब विद्याओं में अतिशय देदीप्यमान है यह प्रसिद्ध ही है।

तथा (यह ज्ञान) समस्त गुप्त रखनेयोग्य भावों का भी राजा है। एवं यह बड़ा पवित्र और उत्तम भी है, अर्थात् सम्पूर्ण पवित्र करने वालों को पवित्र करनेवाला यह ब्रह्मज्ञान सबसे उत्कृष्ट है। जो अनेक सहस्र जन्मोंमें इकट्ठे हुए पुण्य-पापादि कर्मों को क्षणमात्रमें मूलसहित भस्म कर देता है उसकी पवित्रताका क्या कहना है?

साथ ही यह ज्ञान प्रत्यक्ष अनुभव में आनेवाला है, अर्थात् सुख आदिकी भाँति जिसका प्रत्यक्ष अनुभव हो सके, ऐसा है।

अनेक गुणों से युक्त वस्तुका भी धर्मसे विरोध देखा जाता है, परंतु आत्मज्ञान उनकी तरह धर्मविरोधी नहीं है बल्कि धर्म्य—धर्ममय है अर्थात् धर्मसे युक्त है।

ऐसा पदार्थ भी दुःसम्पाद्य (प्राप्त करने में बड़ा कठिन) हो सकता है। इसलिये कहते हैं कि वह ज्ञान रत्नों के विवेक-विज्ञानकी भाँति समझने में बड़ा सुगम है।

परंतु संसारमें अल्प परिश्रमसे सुखपूर्वक सम्पन्न होनेवाले कर्मोंका अल्प फल और कठिनतासे सम्पन्न होनेवाले कर्मोंका महान् फल देखा गया है, अतः यह ज्ञान भी सुगमतासे सम्पन्न होनेवाला होनेके कारण अपने फलका क्षय होनेपर क्षीण हो जायगा, ऐसी शङ्का प्राप्त होनेपर कहते हैं—

यह ज्ञान अव्यय है अर्थात् कर्मों की भाँति फलनाशके द्वारा इसका नाश नहीं होता। अतः यह आत्मज्ञान श्रद्धा करने योग्य है ॥ २ ॥

परंतु जो—

तात्पर्य पढ़ें

राजविद्या विद्यानां राजा दीप्त्यतिशयत्वात् दीप्यते हि इयम् अतिशयेन ब्रह्मविद्या सर्वविद्यानाम् ।

तथा राजगुह्यं गुह्यानां राजा । पवित्रम् पावनम् इदम् उत्तमं सर्वेषां पावनानां शुद्धिकारणम् इदं ब्रह्मज्ञानम् उत्कृष्टतमम् । अनेकजन्मसहस्रसञ्चितम् अपि धर्माधर्मादि समूलं कर्म क्षणमात्राद् भस्मीकरोति यतः अतः किं तस्य पावनत्वं वक्तव्यम् ।

किं च प्रत्यक्षावगमं प्रत्यक्षेण सुखादेः इव

अवगमो यस्य तत् प्रत्यक्षावगमम् ।

अनेकगुणवतः अपि धर्मविरुद्धत्वं दृष्टं न तथा आत्मज्ञानं धर्मविरोधि किन्तु धर्म्यं धर्माद् अनपेतम् ।

एवम् अपि स्याद् दुःसम्पाद्यम् इति अत

आह सुसुखं कर्तुं यथा रत्नविवेकविज्ञानम्।

तत्र अल्पायासानां कर्मणां सुखसम्पाद्यानाम् अल्पफलत्वं दुष्कराणां च महाफलत्वं दृष्टम् इति इदं तु सुखसम्पाद्यत्वात् फलक्षयाद् व्येति इति प्राप्तम् अत आह—

अव्ययं न अस्य फलतः कर्मवद् व्ययः अस्ति इति अव्ययम् अतः श्रद्धेयम् आत्म-ज्ञानम् ॥ २ ॥

ये पुनः—