अध्याय 9 - श्लोक 33

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ ३३ ॥

kiṃ punarbrāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣayastathā .
anityamasukhaṃ lokamimaṃ prāpya bhajasva mām .. 33 ..


किस प्रकार (भजन-सेवा करें सो कहा जाता है—)

फिर जो पुण्ययोनि ब्राह्मण और राजर्षि भक्त हैं उनका तो कहना ही क्या है ? जो राजा भी हों और ऋषि भी हों, वे राजर्षि कहलाते हैं।

क्योंकि यह बात है, इसलिये इस अनित्य, क्षणभङ्गुर और सुखरहित मनुष्यलोक को पाकर अर्थात् परम पुरुषार्थ के साधनरूप दुर्लभ मनुष्य-शरीर को पाकर मुझ ईश्वर का ही भजन कर—मेरी ही सेवा कर ॥ ३३ ॥

तात्पर्य पढ़ें

किं पुनः ब्राह्मणाः पुण्याः पुण्ययोनयो भक्ता राजर्षयः तथा राजानः च ते ऋषयः च इति राजर्षयः।

यत एवम् अतः अनित्यं क्षणभङ्गुरम् असुखं च सुखवर्जितम् इमं लोकं मनुष्यलोकं प्राप्य, पुरुषार्थसाधनं दुर्लभं मनुष्यत्वं लब्ध्वा भजस्व सेवस्व माम् ॥ ३३ ॥