अध्याय 9 - श्लोक 5

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भूतभूत्र च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥ ५ ॥

na ca matsthāni bhūtāni paśya me yogamaiśvaram .
bhūtabhūtra ca bhūtastho mamātmā bhūtabhāvanaḥ .. 5 ..


(वास्तवमें) ब्रह्मादि सब प्राणी भी मुझमें स्थित नहीं हैं, तू मेरे इस ईश्वरीय योग—युक्ति—घटना को देख, अर्थात् मुझ ईश्वर के योग को यानी यथार्थ आत्मतत्त्व को समझ।

‘संसर्गरहित आत्मा कहीं भी लिप्त नहीं होता’ यह श्रुति भी संसर्गरहित होने के कारण (आत्मा की) निर्लेपता दिखलाती है।

यह और भी आश्चर्य देख कि भूतभावन मेरा आत्मा संसर्गरहित होकर भी भूतों का भरण-पोषण करता रहता है परंतु भूतों में स्थित नहीं है। क्योंकि परमात्मा का भूतों में स्थित होना सम्भव नहीं, यह बात उपर्युक्त न्याय से स्पष्ट दिखलाया जा चुका है।

पू०—(जब कि आत्मा अपने से कोई अन्य वस्तु ही नहीं है) तो ‘मेरा आत्मा’ यह कैसे कहा जाता है ?

उ०—लौकिक बुद्धि का अनुकरण करते हुए देहादि संघात को आत्मा से अलग करके फिर उसमें अहंकार का अध्यारोप करके ‘मेरा आत्मा’ ऐसा कहते हैं, आत्मा

अपने-आप से भिन्न है ऐसा समझकर लोगों की भाँति अज्ञानपूर्वक ऐसा नहीं कहते।

जो भूतों को प्रकट करता है—उत्पन्न करता है या बढ़ाता है उसको भूतभावन कहते हैं ॥ ५ ॥

उपर्युक्त दो श्लोकों द्वारा कहे हुए अर्थ को दृष्टान्त से सिद्ध करते हुए कहते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

न च मत्स्थानि भूतानि ब्रह्मादीनि पश्य मे योगं युक्तिं घटनं मे मम ऐश्वरम् ईश्वरस्य इमम् ऐश्वरं योगम् आत्मनो याथात्म्यम् इत्यर्थः ।

तथा च श्रुतिः असंसर्गित्वाद् असङ्गतां दर्शयति ‘असङ्गो न हि सज्जते’ (बृह० उ० ३।९। २६) इति।

इदं च आश्चर्यम् अन्यत् पश्य भूतभृद् असङ्गः अपि सन् भूतानि बिभर्ति न च भूतस्थो यथोक्तेन न्यायेन दर्शितत्वाद् भूतस्थत्वानुपपत्तेः ।

कथं पुनः उच्यते असौ मम आत्मा इति,

विभज्य देहादिसङ्घातं तस्मिन् अहङ्कारम् अध्यारोप्य लोकबुद्धिम् अनुसरन् व्यपदिशति मम आत्मा इति, न पुनः आत्मन आत्मा अन्य

इति लोकवद् अजानन्।

तथा भूतभावनो भूतानि भावयति उत्पादयति वर्धयति इति वा भूतभावनः ॥ ५ ॥

यथोक्तेन श्लोकद्वयेन उक्तम् अर्थं दृष्टान्तेन उपपादयन् आह—