अध्याय 9 - श्लोक 7

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ ७ ॥

sarvabhūtāni kaunteya prakṛtiṃ yānti māmikām .
kalpakṣaye punastāni kalpādau visṛjāmyaham .. 7 ..


सम्पूर्ण प्राणी, हे कुन्तीपुत्र! प्रलयकाल में मेरी त्रिगुणमयी—अपरा-निकृष्ट प्रकृतिको प्राप्त हो जाते हैं और फिर कल्प के आदि में अर्थात् उत्पत्तिकाल में मैं पहले की भाँति पुनः उन प्राणियों को रचता हूँ—उत्पन्न करता हूँ ॥ ७ ॥

इस प्रकार अविद्यारूप—

तात्पर्य पढ़ें

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं त्रिगुणात्मिकाम् अपरां निकृष्टां यान्ति मामिकां मदीयां कल्पक्षये प्रलयकाले। पुनः भूयः तानि भूतानि उत्पत्ति-काले कल्पादौ विसृजामि उत्पादयामि अहं पूर्ववत् ॥ ७ ॥

एवं अविद्यालक्षणम्—