नेबध्नन्ति धनञ्जय ।
तेषु कर्मसु ॥ ९ ॥
na ca māṃ tāni karmāṇi udāsīnavadāsīnamasaktaṃ
nebadhnanti dhanañjaya .
teṣu karmasu .. 9 ..
हे धनंजय! भूतसमुदाय की विषम रचनानिमित्तक वे कर्म, मुझ ईश्वर को बन्धन में नहीं डालते।
उन कर्मों का सम्बन्ध न होने में कारण बतलाते हैं—
मैं उन कर्मों में उदासीन की भाँति स्थित रहता हूँ अर्थात् आत्मा निर्विकार है, इसलिये जैसे कोई उदासीन—उपेक्षा करनेवाला स्थित हो उसी की भाँति मैं स्थित रहता हूँ। तथा उन कर्मों में फलसम्बन्धी आसक्ति से और ‘मैं करता हूँ’ इस अभिमान से भी मैं रहित हूँ (इस कारण वे कर्म मुझे नहीं बाँधते)।
इससे यह अभिप्राय समझ लेना चाहिये कि कर्तापन के अभिमान का अभाव और फलसम्बन्धी आसक्ति का अभाव दूसरों को भी बन्धनरहित कर देनेवाला है। इसके सिवा अन्य प्रकार से किये हुए कर्मों द्वारा मूर्खलोग कोशकार (रेशम के कीड़े)-की भाँति बन्धन में पड़ते हैं ॥ ९ ॥
यहाँ यह शङ्का होती है कि ‘इस भूतसमुदाय को मैं रचता हूँ, तथा मैं उदासीन की भाँति स्थित रहता हूँ’ यह कहना परस्पर विरुद्ध है। इस शङ्का को दूर करने के लिये कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
न च माम् ईशं तानि भूतग्रामस्य विषम-विसर्गनिमित्तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
तत्र कर्मणाम् असंबद्धत्वे कारणम् आह—
उदासीनवद् आसीनं यथा उदासीन उपेक्षकः
कश्चित् तद्वद् आसीनम् आत्मनः अविक्रियत्वात्
असक्तं फलासङ्गरहितम् अभिमानवर्जितम् अहं करोमि इति तेषु कर्मसु।
अतः अन्यस्य अपि कर्तृत्वाभिमानाभावः
फलासङ्गाभावः च अबन्धकारणम् अन्यथा
कर्मभिः बध्यते मूढः कोशकारवद् इति
अभिप्रायः ॥ ९ ॥
तत्र भूतग्रामम् इमं विसृजामि उदासीनवद् आसीनम् इति च विरुद्धम् उच्यते इति तत्परिहारार्थम् आह—