श्रीमद्भगवद्गीता संसार के अनेकानेक धर्मग्रन्थों में एक विशेष स्थान रखती है। श्रीकृष्णभगवान् स्वयं इसके वक्ता हैं और उनका कहना है ‘गीता मे हृदयं पार्थ’ अतएव गीता सनातनधर्मावलम्बियों के हृदय की राजेश्वरी हो, इसमें कोई आश्चर्य नहीं। साथ ही अन्य धर्मावलम्बियों एवं देश-देशान्तरवासियों द्वारा भी यह अति प्रशंसित है। इसका दिव्य सन्देश किसी जाति वा देशविशेष के ही लिये उपादेय नहीं, इसका अमूल्य उपदेश सार्वभौम है। अपनी-अपनी भावना के अनुसार असंख्य मनुष्यों ने गीता के उपदेशों का अनुसरण कर संसारयात्रा को सुखपूर्वक पूरा किया है, उसके दृढ़ आलम्बन से वे केवल भवसागर ही पार नहीं उतरे, अपने और मनोरथों की भी सिद्धि कर सके हैं। गीता सर्वशास्त्रमयी है। समस्त शास्त्रों का मथन कर अमृतमयी गीता का आविर्भाव हुआ है। सर्वसिद्धान्तों का जैसा सुन्दर और युक्तियुक्त समन्वय गीता में मिलता है वैसा अन्य किसी ग्रन्थ में कदाचित् ही उपलब्ध हो।
मतमतान्तरों के वादविवाद, परम निःश्रेयस की प्राप्ति के नाना मार्गों की बदाबदी का कोलाहल गीता के गम्भीर उपदेश में शान्त होकर परस्पर सहायक हो जाता है। गीता में नाना सिद्धान्तों का एकीकरण ऐसी सुन्दरता से किया गया है कि तत्त्व-जिज्ञासु को समस्त पथ एक ही राजमार्ग की ओर प्रवृत्त करते हैं। अधिकार और भावना के अनुरूप ही साधन का आदेश मिल जाता है। एक और भी विशेषता इस ग्रन्थरत्न में देखने को मिलती है। मनुष्य के लिये उच्चतम आदर्श का निश्चय किया गया है और साथ ही उसको प्राप्त करने के लिये सुलभ-से-सुलभ साधन भी बताये गये हैं। यही कारण है कि इस सात सौ श्लोक की छोटी-सी गीता को कामधेनु और कल्पवृक्ष की उपमा दी जाती है। महात्माओं ने इस पर भाष्य रचकर आचार्य की पदवी पायी। अनेक टीकाकारों ने अपनी बुद्धि को इस कसौटी पर कस पण्डित और ज्ञानी की दुर्लभ ख्याति पायी और ज्ञानचक्षु प्रदान कर इसके तत्त्वानुसन्धान में साधारण गति के लोगों को इसका मर्म हृदयङ्गम करने में सहायता प्रदान की। विद्या का परमलाभ गीता के रहस्य को समझना ही माना गया है।
आचार्यों ने अपने-अपने सिद्धान्तों की प्रामाणिकता स्थापन करने में गीता को एक मुख्य आधार माना है। गीता पर भाष्य रच अपने सिद्धान्तों को गीता-सम्मत बताना ही उनका लक्ष्य रहा है। गीता-विरोधी किसी धर्म वा सम्प्रदाय का प्रचार वे असम्भव समझते और जिस धर्म, आचार वा सिद्धान्त को ब्रह्मरूपा गीता से सिद्ध कर दिया, वह अवश्य ही सर्वशास्त्र और वेद-सम्मत मान लिया जाता है।
सम्प्रदाय, जाति और देश की भिन्नता का निराकरण करनेवाला गीता एक सार्वभौम सिद्धान्तप्रतिपादक ग्रन्थ-रत्न है। उसके उपदेश और निर्दिष्ट साधनों ने मानव-जाति के लिये एक महान् धर्म की नींव डाली है, उसके प्रचार से प्राणिमात्र का कल्याण सम्भव है। हृदय-दौर्बल्य पर विजयी होकर गीतोक्त उपदेश से मनुष्य कर्मरत हो सकता है। वह भक्तिरसामृत का आस्वादन करता हुआ ज्ञानी बन सकता है। ऐहिक और पारमार्थिक दोनों ही सुखों की प्राप्ति उसे अल्प प्रयास से ही उपलब्ध होने में कोई सन्देह नहीं रहता। आधुनिक काल में जो अनेकानेक जटिल प्रश्न नित्यप्रति समाज और व्यक्ति के समक्ष उपस्थित होते रहते हैं और बुद्धि को चकरा
देते हैं, उनके सुलझाने के लिये भी गीता में पर्याप्त सामग्री विद्यमान है। परंतु खेद तो यह है कि ऐसे अवसरों पर गीता से पूर्ण सहायता नहीं ली जाती। इस त्रुटि की पूर्ति के लिये गीता-प्रचार ही एकमात्र उपाय है।
गीता के अध्ययन, श्रवण आदि से जो लाभ होता है उसको भगवान् ने स्वयं अर्जुन के प्रति अपने उपदेश की समाप्ति में कहा है; फिर गीता-प्रचार से अधिक भगवत्प्रीत्यर्थ और कौन कार्य मनुष्य से बन सकता है। भगवदाज्ञा को यथाशक्ति पालन करने और उन्हीं के कल्याणकारी उपदेशों के प्रचार की प्रेरणा से गीता का यह संस्करण प्रकाशित हुआ है। शांकरभाष्य का छपा हुआ मूल तो सुलभप्राप्त है परंतु मूल के साथ ही सरल हिन्दी-अनुवाद नहीं मिलता। नवलकिशोरप्रेस, लखनऊ से प्रकाशित ‘नवलभाष्य’ में कई संस्कृतभाष्य और टीकाएँ प्रकाशित हुई थीं, परंतु वह हिन्दी-अनुवाद स्वतन्त्र था तिस पर भी वह ग्रन्थ अप्राप्य है और मूल्य अत्यधिक होने से सुलभ नहीं, दूसरा ग्रन्थ जिसमें अद्वैतसिद्धान्त की टीकाएँ शांकरभाष्य के साथ छपी थीं वह कान्यकुब्ज श्रीजगन्नाथ शुक्ल द्वारा सम्पादित होकर कलकत्ते से प्रकाशित हुआ था। संवत् १९२७ का द्वितीय संस्करण हमारे देखने में आया है। इसमें भी हिन्दी-अनुवाद स्वतन्त्र है। शांकरभाष्य का अनुवाद नहीं है। और वह पुस्तक भी दुष्प्राप्य है। गीता का एक संस्करण उपादेय था। उसका प्रकाशन श्रीज्वालाप्रसाद भार्गव ने आगरे से किया था। इस पुस्तक का केवल उत्तरभाग हमारे पास है। लीथो की छपी पुस्तक है, संवत् दिया नहीं है। इसमें शांकर और रामानुजभाष्य के साथ तीन टीकाएँ भी दी हैं और भाषा-अनुवाद शंकर के आधार पर है। श्रीभार्गवजी बड़े विद्वान् थे। समग्र महाभारत को मूल और अनुवादसहित उन्होंने प्रकाशित किया था और वेदों को भी अर्थसहित छापा था। उनके प्रति कृतज्ञता प्रकाश करना हमारा धर्म है। खेद यही है कि उनके ग्रन्थ कहीं खोजने पर भी अब नहीं मिलते। इन बातों के उल्लेख से केवल यही तात्पर्य है कि प्रस्तुत ग्रन्थ की उपादेयता हमको स्वीकार करना अभीष्ट है। मूल और हिन्दी-अनुवाद शांकरभाष्य का इससे पहले कहीं प्रकाशित हुआ है, ऐसा नहीं जान पड़ता। हिन्दी-भाषा-भाषियों का परम सौभाग्य है जो अल्प मूल्य में ही वे इस उच्च कोटि के ग्रन्थ को, जिस
हमारे धर्मग्रन्थों में गीता का क्या स्थान है और अन्य ग्रन्थों से उसका क्या सम्बन्ध है, विज्ञ सुधीजन भली प्रकार जानते हैं, उसका संक्षिप्त वर्णन ही पर्याप्त होगा। अखिल धर्मों का मूल हिन्दूलोग वेद को मानते हैं। वेद स्वतःप्रमाण और ईश्वर की वाणी है। वेद की आज्ञा के अनुसार धर्म और अधर्म-कार्य का अन्तिम निर्णय होता है। ईश्वरीय ज्ञान भी हमको वेद से ही प्राप्त होता है। अन्य धर्मग्रन्थ वेदोक्त और वेद-प्रतिपादित धर्म को सुलभ रीति से समझाने के लिये निर्मित हुए हैं। वेद ही उनका आधार है। परंतु वेद के दो भाग हैं—मन्त्र और ब्राह्मण। ब्राह्मण-भाग के अन्तर्गत यज्ञादि कर्मकाण्ड हैं और दूसरा आरण्यक वा ज्ञानकाण्ड है। इसी ज्ञानकाण्ड में उपनिषदों की गणना है। प्राचीन शास्त्र और विद्याओं में प्रायः एक उपनिषद्-भाग हुआ करता था जो तद्विषयक रहस्यमय ज्ञान की शिक्षा देता था। उच्च कोटि के अधिकारी उसको गुरुमुख से श्रवण कर प्राप्त कर सकते थे। साधारण जिज्ञासुओं को उस रहस्यमय तात्त्विक ज्ञान का अधिकारी नहीं समझा जाता था और उसकी प्राप्ति के लिये गुरु का उपदेश परमावश्यक माना जा
वेदान्त-शास्त्र में उपनिषद् का इसी प्रकार मुख्य स्थान है। वेदों का अन्तिम उपदेश ही वेदान्त है। कर्मकाण्डी को उपनिषद् के रहस्यमय आध्यात्मिक ज्ञान का अधिकारी बनने पर ही उपदेश से लाभ हो सकता
था। इतना ध्यान रखने की बात है कि गुह्यविद्या या उपदेश अनधिकारी को न देने से उसी का कल्याण था। स्वार्थवश गुप्त रखना सिद्धान्तानुकूल नहीं था।
वेदान्त के तीन प्रस्थान हैं। श्रौत-प्रस्थान उपनिषद् हैं जो वेद के ही अंग हैं, दूसरा स्मार्त-प्रस्थान है जो गीता है और तीसरा प्रस्थान दार्शनिक है जो वेदव्यास-प्रणीत ब्रह्मसूत्र है। इन प्रस्थानत्रय के आधार पर समस्त वेदान्त-साहित्य की रचना हुई है। इन्हीं पर भाष्य लिखकर महात्माओं और धर्मप्रवर्तकों ने आचार्य-पदवी प्राप्त की है। देश की यही प्रणाली थी कि प्रस्थानत्रय पर भाष्य रचकर अपने सिद्धान्तों की पुष्टि एवं प्रचार किया जाता था। इनका समन्वय भाष्यों द्वारा किये बिना किसी सिद्धान्त को वेद या धर्ममूलक कहने का कोई साहस नहीं कर सकता था। मतलब यह कि सिद्धान्तप्रतिपादक स्वतन्त्र ग्रन्थरचना की अपेक्षा प्रस्थानत्रयी पर भाष्य लिखने को अधिक महत्त्व दिया गया था और भाष्यों के समन्वय से मत की पुष्टि की जाती थी।
गीता के अध्यायों की समाप्ति में ‘उपनिषत्सु’ शब्द आता है। भगवान् के श्रीमुख से यह उपदेश हुआ है तो वेद और उपनिषद् का दर्जा उसे दिया गया तो कोई आश्चर्य नहीं, परंतु वेद अपौरुषेय हैं और उपनिषद् श्रौत हैं। अतएव गीता स्मार्त-प्रस्थान के ही अन्तर्गत है।
गीता पर अनेक भाष्य और टीकाएँ बनी हैं। और अब भी उसके विवेचन में जो साहित्य बनता जाता है, वह भी उपेक्षणीय नहीं है। परन्तु गीता का अध्ययन स्वतन्त्ररूप से बहुत कम हुआ है। सिद्धान्तप्रतिपादन और साम्प्रदायिक दृष्टि से ही उस पर अधिक विचार हुआ है। उसका परिणाम यह हुआ है कि गीता का वास्तविक अर्थ कठिनता से समझ में आता है। प्रतिभाशाली आचार्यों और टीकाकारों के मतविभिन्नता से साधारण बुद्धि के लोग घबड़ा जाते हैं। महाकवि और उसके उत्कृष्ट काव्य में ऐसी शक्ति होती है कि समाज की प्रगति के साथ उसमें नये अर्थ निकाले जाते हैं और उसके द्वारा नवीन भावनाओं की पूर्ति होती रहती है। फिर गीता-जैसे अतुलनीय ग्रन्थ में समय-समय पर आवश्यकतानुसार अनेक आशय और अर्थ निकाले गये तो कोई नयी बात नहीं है। इससे ग्रन्थ की महिमा का परिचय मिलता है। परन्तु उसके मूल सिद्धान्तों को यथावत् निश्चयपूर्वक खोज निकालना अवश्य ही अति कठिन हो जाता है। जिस ग्रन्थ ने अपूर्व समन्वय किया है, वही मत-विभिन्नता के कारण परस्परविरोधी सिद्धान्तों का समर्थक बना लिया गया है। मनुष्य को सत्य का अंश भी बुद्धिगम्य हो जाय तो वह कृतकृत्य हो जाता है। भाष्यकारों ने जैसा अपने अनुभव से गीता के तत्त्व को समझा, वैसा ही वर्णन किया है। उनके समन्वय में जो आनन्द है, वह उनके पक्षपात और विरोध की आलोचना में नहीं है। अतएव इस बात की चर्चा यहाँ अभीष्ट नहीं है कि गीता के वास्तविक अर्थ की रक्षा भगवान् शंकराचार्य ने अपने भाष्य में कहाँतक की है। प्रचारक को सम्भवत
यह भी याद रखना उचित है—
शङ्करः शङ्करः साक्षाद् व्यासो नारायणः स्वयम् ।
तयोर्विवादे सम्प्राप्ते न जाने किं करोम्यहम् ॥
भगवान् शंकराचार्य के कुछ सिद्धान्तों का स्थूलरूप से वर्णन करना युक्तियुक्त है, जिससे गीताभाष्य में जो उनका दृष्टिबिन्दु है वह सहज में अवगत हो जाय। इस बात के मानने में हमें कोई संकोच नहीं कि अनेक
वाक्य गीता में ऐसे मिल सकते हैं, जिनको द्वैत और अद्वैतसिद्धान्ती अपना प्रमाणवचन बना सकते हैं, गीता के कई मार्मिक श्लोक दोनों पक्षों के समर्थक समझे जा सकते हैं।
श्रीशंकराचार्य से पूर्व जो गीता पर भाष्य लिखे गये उनमें से अब एक भी नहीं मिलता। भर्तृप्रपञ्च के भाष्य का श्रीशंकराचार्य ने उल्लेख किया है और उसका खण्डन भी किया है। भर्तृप्रपञ्च के अनुसार कर्म और ज्ञान दोनों से मिलकर मोक्ष की प्राप्ति होती है, श्रीशंकराचार्य केवल विशुद्ध ज्ञान ही मोक्षप्राप्ति का उपाय बताते हैं। यही भेद एकायन-सम्प्रदाय और उपनिषद् में भी है। एकायन के मत में आत्मा परमेश्वर का अंश है और उसी के आश्रित है। उपनिषद् आत्मा और ब्रह्म की अभिन्नता का निरूपण करते हैं। उपनिषद् में ज्ञान मोक्ष का साधन है और एकायन प्रपत्ति से मोक्ष मानते हैं। और गीता में स्पष्ट ऐसे वचन हैं कि जीव ईश्वर का सनातन अंश है ‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः’ और ईश्वर की शरणागति और आश्रय में ही उसका कल्याण है, ‘मामेकं शरणं व्रज’ यह सिद्धान्तवाक्य प्रपत्ति का पोषक है। भक्तिहीन कर्म व्यर्थ है और भक्तिहीन ज्ञान शुष्क एवं नीरस है। उपनिषद् के अनुसार प्रकृति मिथ्या है और एकायन प्रकृति को नित्य परन्तु परमेश्वर के अधीन मानते हैं। उपनिषद् के अनुसार ज्ञानी के लिये प्रकृति विलीन हो जाती है और एकायन का मत है कि ज्ञानी प्रकृति के खेल को देखा करता है। इस प्रकार यह ज्ञात होता है कि पाञ्चरात्र और एकायन के सिद्धान्त गीता में स्पष्ट मिलते हैं। परन्तु यह भी सहसा नहीं कहा जा सकता कि श्रीशंकराचार्य के सिद्धान्तों का भी समर्थन गीता पूर्णतः नहीं करती।
वैसे तो शांकरसिद्धान्त का विस्तृत रूप से प्रतिपादन ब्रह्मसूत्र के शारीरक नामक भाष्य में किया गया है, परन्तु गीता-भाष्य से भी वह भली प्रकार अवगत हो जाता है। सिद्धान्त अति संक्षेप से यह है कि मनुष्य को निष्कामभाव से स्वकर्म में प्रवृत्त रहकर चित्तशुद्धि करनी चाहिये। चित्तशुद्धि का उपाय ही फलाकाङ्क्षा को छोड़कर कर्म करना है। जबतक चित्तशुद्धि न होगी, जिज्ञासा उत्पन्न नहीं हो सकती, बिना जिज्ञासा के मोक्ष की इच्छा ही असम्भव है। पश्चात् विवेक का उदय होता है। विवेक का अर्थ है नित्य और अनित्य वस्तु का भेद समझना। संसार के सभी पदार्थ अनित्य हैं और केवल आत्मा उनसे पृथक् एवं नित्य है, ऐसा अनुभव होने से विवेक में दृढ़ता होती है, दृढ़ विवेक से वैराग्य उत्पन्न होता है। लोकपरलोक के यावत् सुख और भोगों के प्रति पूर्ण विरक्ति बिना वैराग्य दृढ़ नहीं होता। अनित्य वस्तुओं में वैराग्य मोक्ष का प्रथम कारण है और इसी से शम, दम, तितिक्षा और कर्म-त्याग सम्भव होते हैं, इसके पश्चात् मोक्ष का कारण जो ज्ञान है; उसका उदय होता है। बिना विशुद्ध ज्ञान के मोक्ष किसी प्रकार भी नहीं मिल सकता।
न योगेन न सांख्येन कर्मणा नो न विद्यया ।
ब्रह्मात्मकबोधेन मोक्षः सिद्ध्यति नान्यथा ॥
जिन साधनों का फल अनित्य है वे मोक्ष के कारण हो ही नहीं सकते। मोक्ष का स्वरूप है जीवात्मा-परमात्मा की अभिन्नता का ज्ञान। दोनों एक स्वरूप हैं, इसी ज्ञान का नाम मोक्ष है।
जीवात्मा-परमात्मा में जो भेद मालूम होता है वह प्रकृति के कारण से है। इस भ्रान्ति की निवृत्ति ज्ञानद्वारा होती है। द्वैत जो भासता है उसका कारण माया है। और वह माया अनिर्वचनीया है। न तो वह सत् है और न असत है और दोनोंही के धर्म उसमें भासते हैं। इसीलिये उसको ‘अनिर्वचनीया’ विशेषण दिया गया
है। वास्तव में माया भी मिथ्या है। क्योंकि सत् से असत् की उत्पत्ति सम्भव नहीं और सत्-असत् का मेल भी सम्भव नहीं और असत् में कोई शक्ति ही नहीं। अतएव जगत् केवल भ्रान्तिमात्र है और स्वप्रवत् है।
भगवान् शंकराचार्य को ‘मायावादी’ कहना न्यायसंगत नहीं। उन्होंने माया का प्रतिपादन नहीं किया। जब विपक्षी दृश्यमान, परन्तु मिथ्या जगत् का कारण आग्रहपूर्वक पूछता है तो माया को, जो स्वयं मिथ्या है, बता दिया जाता है। यही कारण है कि जीवभाव वा जीव का यह अनुभव कि वह बद्ध है, वास्तव में कल्पित है, अज्ञान के आवरण से जीव अपने स्वरूप को भूला हुआ है और ज्ञान ही इस अज्ञान का नाशक है।
भगवान् शंकराचार्य निवृत्ति-मार्ग के उपदेष्टा हैं और गीता को भी उन्होंने निवृत्ति-मार्ग-प्रतिपादक ग्रन्थ माना है। उनके मतानुसार संन्यास के बिना मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता। यही उनका पुनः-पुनः कथन है। परन्तु इतना ध्यान रखना उचित है कि कर्म वा प्रवृत्तिमार्ग को वे चित्तशुद्धि के लिये आवश्यक समझते हैं। अतएव वे सभी को संन्यास का अधिकारी नहीं मानते। सच्चा संन्यास अर्थात् विद्वत्संन्यास वही है जिसमें मनुष्य किसी वस्तु का त्याग नहीं करता वरं पके फल जैसे वृक्ष से आप ही गिर पड़ते हैं, संसार से वह सर्वथा निर्लिप्त हो जाता है। लोहे के तप्त गोले को हाथ से छोड़ देने के लिये किसके आदेश की प्रतीक्षा होती है?
गीताभाष्य में यही सिद्धान्त भगवान् शंकराचार्य ने प्रतिपादित किया है। आधुनिक संसार के इतिहास में शंकर-जैसा कोई ज्ञानी और दार्शनिक दूसरा नहीं मिलता। उनके सिद्धान्तों को समझने में यह हिन्दी-अनुवाद अत्यन्त सहायक होगा, इसमें कोई सन्देह नहीं। अनुवादक महाशय के सराहनीय परिश्रम की सफलता इसी में है कि आचार्य के सिद्धान्तों से हम सुगमतापूर्वक परिचय प्राप्त करें और हम में मुमुक्षुता का भाव भली प्रकार जाग्रत् हो।
काशी हिन्दूविश्वविद्यालय आश्विन शुक्ल ४, सं० १९८८
जीवनशंकर याज्ञिक
ॐ नारायणः परोऽव्यक्तादण्डमव्यक्तसम्भवम् ।
अण्डस्यान्तस्त्विमे लोकाः सप्तद्वीपा च मेदिनी ।।
अव्यक्त से अर्थात् माया से श्रीनारायण—आदिपुरुष सर्वथा अतीत (अस्पृष्ट) हैं, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अव्यक्त—प्रकृति से उत्पन्न हुआ है, ये भूः, भुवः आदि सब लोक और सात द्वीपों वाली पृथिवी ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत है।
उस भगवान् ने इस जगत् को रचकर इसके पालन करने की इच्छा करते हुए पहले मरीचि आदि प्रजापतियों को रचकर उनको वेदोक्त प्रवृत्तिरूप धर्म (कर्मयोग) ग्रहण करवाया।
फिर उनसे अलग सनक, सनन्दनादि ऋषियों को उत्पन्न करके उनको ज्ञान और वैराग्य जिसके लक्षण हैं ऐसा निवृत्तिरूप धर्म (ज्ञानयोग) ग्रहण करवाया।
वेदोक्त धर्म दो प्रकार का है—एक प्रवृत्तिरूप, दूसरा निवृत्तिरूप।
जो जगत् की स्थिति का कारण तथा प्राणियों की उन्नति का और मोक्ष का साक्षात् हेतु है एवं कल्याणकामी ब्राह्मणादि वर्णाश्रम-अवलम्बियों द्वारा जिसका अनुष्ठान किया जाता है उसका नाम धर्म है।
बहुत काल के बाद जब धर्मानुष्ठान करने वालों के अन्तःकरण में कामनाओं का विकास होने से विवेक-विज्ञान का ह्रास हो जाना ही जिसकी उत्पत्ति का कारण है ऐसे अधर्म से धर्म दबता जाने लगा और अधर्म की वृद्धि होने लगी तब जगत् की स्थिति सुरक्षित रखने की इच्छा वाले वे आदिकर्ता नारायण नामक श्रीविष्णु भगवान् भूलोक के ब्रह्म की अर्थात् भूदेवों (ब्राह्मणों)-के ब्राह्मणत्व की रक्षा करने के लिये श्रीवसुदेवजी से श्रीदेवकीजी के गर्भ में अपने अंश से (लीलाविग्रह से) श्रीकृष्णरूप में प्रकट हुए। यह प्रसिद्ध है।
ब्राह्मणत्व की रक्षा से ही वैदिक धर्म सुरक्षित रह सकता है, क्योंकि वर्णाश्रमों के भेद उसी के अधीन हैं।
ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज आदि से सदा सम्पन्न वे भगवान् यद्यपि अज, अविनाशी, सम्पूर्ण भूतों के ईश्वर और नित्य शुद्ध-बुद्ध मुक्त स्वभाव हैं, तो भी अपनी त्रिगुणात्मिका मूल प्रकृति वैष्णवी माया को वश में करके अपनी लीला से शरीरधारी की तरह उत्पन्न हुए-से और लोगों पर अनुग्रह करते हुए-से दीखते हैं।
अपना कोई प्रयोजन न रहने पर भी भगवान् ने भूतों पर दया करने की इच्छा से, यह सोचकर कि अधिक गुणवान् पुरुषों द्वारा ग्रहण किया हुआ और आचरण किया हुआ धर्म अधिक विस्तार को प्राप्त होगा, शोकमोहरूप महत्समुद्र में डूबे हुए अर्जुन को दोनों ही प्रकार के वैदिक धर्मों का उपदेश किया।
उक्त दोनों प्रकार के धर्मों को भगवान् ने जैसे- जैसे कहा था ठीक वैसे ही सर्वज्ञ भगवान् वेदव्यासजी ने गीतानामक सात सौ श्लोकों के रूप में ग्रथित किया।
ऐसा यह गीताशास्त्र सम्पूर्ण वेदार्थ का सार-संग्रह-रूप है और इसका अर्थ समझने में अत्यन्त कठिन है।
यद्यपि उसका अर्थ प्रकट करने के लिये अनेक पुरुषों ने पदच्छेद, पदार्थ, वाक्यार्थ और आक्षेप, समाधानपूर्वक उसकी विस्तृत व्याख्याएँ की हैं, तो भी लौकिक मनुष्यों द्वारा उस गीताशास्त्र का अनेक प्रकार से (परस्पर) अत्यन्त विरुद्ध अनेक अर्थ ग्रहण किये जाते देखकर, उसका विवेकपूर्वक अर्थ निश्चित करने के लिये मैं संक्षेप से व्याख्या करूँगा।
संक्षेप में इस गीताशास्त्र का प्रयोजन परमकल्याण अर्थात् कारणसहित संसार की अत्यन्त उपरतिरूप है, यह (परमकल्याण) सर्वकर्मसन्न्यासपूर्वक आत्मज्ञाननिष्ठारूप धर्म से प्राप्त होता है।
इसी गीतार्थरूप धर्म को लक्ष्य करके स्वयं भगवान् ने ही अनुगीता में कहा है कि **‘ब्रह्म के परमपद को (मोक्ष को) प्राप्त करने के लिये वह (गीतोक्त ज्ञाननिष्ठारूप) धर्म ही सुसमर्थ है।’**
इसके सिवा कहीं ऐसा भी कहा है कि **‘जो न धर्मी, न अधर्मी और न शुभाशुभी होता है तथा जो कुछ भी चिन्तन न करता हुआ तूष्णीभाव से एक जगदाधार ब्रह्म में लीन हुआ रहता है ( वही उसको पाता है )।’**
यह भी कहा है कि **‘ज्ञान का लक्षण (चिह्न) संन्यास है।’**
यहाँ (गीताशास्त्र में) भी अन्त में अर्जुन से कहा है— **‘सब धर्मों को छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जा।’**
अभ्युदय—सांसारिक उन्नति ही जिसका फल है ऐसा जो प्रवृत्तिरूप धर्म, वर्ण और आश्रमों को लक्ष्य करके कहा गया है, वह यद्यपि स्वर्गादि की प्राप्ति का ही साधन है तो भी फल-कामना छोड़कर ईश्वरार्पणबुद्धि से किया जाने पर अन्त:करण की शुद्धि करनेवाला होता है।
तथा शुद्धान्तःकरण पुरुष को पहले ज्ञाननिष्ठा को योग्यताप्राप्ति कराकर फिर ज्ञानोत्पत्ति का कारण होने-से (वह प्रवृत्तिरूप धर्म) कल्याण का भी हेतू होता है।
इसी अर्थ को लक्ष्य में रखकर आगे कहेंगे कि, **‘कर्मों को ब्रह्म में अर्पण कर’ ‘योगिजन आसक्ति छोड़कर आत्मशुद्धि के लिये कर्म करते हैं’** इत्यादि।
परमकल्याण ही जिनका प्रयोजन है, ऐसे इन दो प्रकार के धर्मों को और लक्ष्यभूत वासुदेवनामक परब्रह्मरूप परमार्थतत्त्व को विशेषरूप से अभिव्यक्त (प्रकट) करनेवाला यह गीताशास्त्र असाधारण प्रयोजन, सम्बन्ध और विषय वाला है।
ऐसे इस (गीताशास्त्र)-का अर्थ जान लेने पर समस्त पुरुषार्थों की सिद्धि होती है, अतएव इसकी व्याख्या करने के लिये मैं प्रयत्न करता हूँ।
तात्पर्य पढ़ें
स भगवान् सृष्ट्वा इदं जगत् तस्य च स्थितिं चिकीर्षुः मरीच्यादीन् अग्रे सृष्ट्वा प्रजापतीन् प्रवृत्तिलक्षणं धर्मं ग्राहयामास वेदोक्तम्।
ततः अन्यान् च सनकसनन्दनादीन् उत्पाद्य निवृत्तिलक्षणं धर्मं ज्ञानवैराग्यलक्षणं ग्राहयामास।
द्विविधो हि वेदोक्तो धर्मः प्रवृत्तिलक्षणो निवृत्तिलक्षणः च।
जगतः स्थितिकारणं प्राणिनां साक्षात् अभ्युदयनिःश्रेयसहेतुः यः स धर्मो ब्राह्मणाद्यैः वर्णिभिः आश्रमिभिः च श्रेयोऽर्थिभिः अनुष्ठीयमानः।
दीर्घेण कालेन अनुष्ठातॄणां कामोद्धवाद् हीयमानविवेकविज्ञानहेतुकेन अधर्मेण अभि-भूयमाने धर्मे प्रवर्धमाने च अधर्मे, जगतः स्थितिं परिपिपालयिषुः स आदिकर्ता नारायणाख्यो विष्णुः भौमस्य ब्रह्मणो ब्राह्मणत्वस्य रक्षणार्थं देवक्यां वसुदेवाद् अंशेन कृष्णः किल सम्बभूव ।
ब्राह्मणत्वस्य हि रक्षणेन रक्षितः स्याद् वैदिको धर्मः तदधीनत्वाद् वर्णाश्रमभेदानाम् ।
स च भगवान् ज्ञानैश्वर्यशक्तिबलवीर्य- तेजोभिः सदा सम्पन्नः त्रिगुणात्मिकां वैष्णवीं स्वां मायां मूलप्रकृतिं वशीकृत्य अजः अव्ययो भूतानाम् ईश्वरो नित्यशुद्धबुद्ध- मुक्तस्वभावः अपि सन् स्वमायया देहवान् इव जात इव च लोकानुग्रहं कुर्वन् इव लक्ष्यते ।
स्वप्रयोजनाभावे अपि भूतानुजिघृक्षया वैदिकं हि धर्मद्वयम् अर्जुनाय शोकमोह-महोदधौ निमग्राय उपदिदेश, गुणाधिकैः हि गृहीतः अनुष्ठीयमानः च धर्मः प्रचयं गमिष्यति इति।
तं धर्मं भगवता यथोपदिष्टं वेदव्यासः सर्वज्ञो भगवान् गीताख्यैः सप्तभिः श्लोकशतैः उपनिबबन्ध।
तद् इदं गीताशास्त्रं समस्तवेदार्थसारसङ्ग्रहभूतं द्विज्ञेयार्थम् ।
तदर्थाविष्करणाय अनेकैः विवृतपदपदार्थ-वाक्यार्थन्यायम् अपि अत्यन्तविरुद्धानेकार्थ-
त्वेन लौकिकैः गृह्यमाणम् उपलभ्य अहं
विवेकतः अर्थनिर्धारणार्थं सङ्क्षेपतो विवरणं करिष्यामि ।
तस्य अस्य गीताशास्त्रस्य सङ्क्षेपतः प्रयोजनं परं निःश्रेयसं सहेतुकस्य संसारस्य अत्यन्तोपरमलक्षणम् । तत् च सर्वकर्मसन्न्यास-पूर्वकाद् आत्मज्ञाननिष्ठारूपाद् धर्माद् भवति ।
तथा इमम् एव गीतार्थधर्मम् उद्दिश्य भगवता
एव उक्तम् ‘स हि धर्मः सुपर्याप्तो ब्रह्मणः पदवेदने’ इति अनुगीतासु।
किं च अन्यदपि तत्रैव उक्तम्—
‘नैव धर्मी न चाधर्मी न चैव हि शुभाशुभी ।
यः स्यादेकासने लीनस्तूष्णीं किञ्चिदचिन्तयन् ॥’
‘ज्ञानं सन्न्यासलक्षणम्’ इति च।
इह अपि च अन्ते उक्तम् अर्जुनाय—‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’ इति।
अभ्युदयार्थः अपि यः प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो वर्णाश्रमान् च उद्दिश्य विहितः स देवादि-स्थानप्राप्तिहेतुः अपि सन् ईश्वरार्पणबुद्ध्या अनुष्ठीयमानः सत्त्वशुद्धये भवति फलाभि-सन्धिवर्जितः ।
शुद्धसत्त्वस्य च ज्ञाननिष्ठायोग्यताप्राप्तिद्वारेण ज्ञानोत्पत्तिहेतुत्वेन च निःश्रेयसहेतुत्वम् अपि प्रतिपद्यते ।
तथा च इमम् एव अर्थम् अभिसन्धाय वक्ष्यति—‘ब्रह्मण्याधाय कर्माणि’ ‘योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये’ इति।
इमं द्विप्रकारं धर्मं निःश्रेयसप्रयोजनं परमार्थतत्त्वं च वासुदेवाख्यं परब्रह्म अभिधेय-भूतं विशेषतः—अभिव्यञ्जयद् विशिष्टप्रयोजन-सम्बन्धाभिधेयवद् गीताशास्त्रम् ।
यतः तदर्थे विज्ञाते समस्तपुरुषार्थसिद्धिः,
अतः तद्विवरणे यत्नः क्रियते मया ।